पिछले एक साल से लगातार संघर्ष चलता रहा । मां ने आैर मैंने कहां कहां धक्के नहीं खाये ।बहुत ने हौसला बढा़या, यहां जिन साथियों ने हिम्मत दी उससे भी बल मिला । बीच में कुछ से सुनना कि यह कलयुग है, इंसाफ की उम्मीद न करो, कभी निराश भी करता था। लेकिन मुझे तो यह भी लगातार लगता रहा कि हर सुबह मेरे लिए नई उम्मीद व सहारा लिए आ रही है । बस लगी रही । अपने को नए रूप में खडे़ करने की कोशिश भी साथ ही शुरू कर दी । नए पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स में दाखिला लिया ।आज तो महसूस होता है, साथ देने वाले, आगे बढ़ाने वाले निराशा करने वालों से कहीं ज्यादा थे । तभी अपनी कहानी का सुखांत, आज लिख पा रही हूं । ससुराल वालों से न्याय ने मुझे मुक्ति दिला ही दी । अब उम्मीद है । छह महीने बाद कोर्स पूरा कर मैं बढि़या रोज़गार भी पा ही लूंगी । एक सम्मानित महिला की तरह बाकी जीवन जी सकूंगी ।
'अब डर कैसा' की पहली कड़ी इस लिंक पर और दूसरी कड़ी इस लिंक पर देखें।
Thursday, December 17, 2009
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15 comments:
jeena isii kaa naam haen tum ko ab sashkt hona haen aur jeendgi ko jeena haen , apane hissae kae sukho ko khojna haen
meri ishwar sae kamana haen ki tum hamesha khush raho
हां अब वो करके दिखाइए कि ...आप भी दूसरों के लिए उदाहरण बन जाएं ...एक लडाई जो बहुत मुश्किल थी वो तो आपने जीत ली ...और अब इस जीत को जीतने की आदत में बदल डालिए ...दुनिया आपके कदमों में होगी ...। शुभकामनाएं
शुभकामनाएं
unmukti i don't know much about your story. but i appreciate you for your struggle. best wishes.
यही जीवन है।
एक मुक्त,स्वतंत्र और ख़ुशहाल जीवन के लिये शुभकामनायें।
नए जीवन की बहुत बहुत शुभकामनाएँ। हो सके तो अपने संघर्षों की कथा भी बताएँ।
- आनंद
जीना इसी का नाम है
शुभकामनायें
प्रणाम स्वीकार करें
आपके संघर्षों का बस अनुमान है- पता नहीं. फिर भी अच्छा लगता है किसी स्त्री के जीतने की कहानी पढ़कर. शुभकामनाएं.
उन्मुक्ति,
इस कहानी के जरिए आपको काफी जानने का मौका मिला। इस सुखांत कथा के बाद मेरा विश्वास और गहरा हो गया कि महिला कमजोर नहीं बल्कि ज्यादा ताकतवर होती है,जो तूफान के बीच भी अपनी कश्ती चलाए जाती है, बिना सोचे कि वह कितनी आगे जा पाएगी। दरअसल अगर वह यह न करे तो क्या करे, क्योंकि जब चलना हो तो कदम तो उठाने ही पड़ेंगे, उन्हें लाख जंजीरों से बांधा हो या कि उन पर पत्थरों का बोझ टांग दिया गया हो।
आपने अपनी कहानी से कई लोगों को हिम्मत दी होगी, उत्साह बढ़ाया होगा। जीवन में आप ऐसे ही सार्थक क्षण जीती रहें, इसी शुभकामना के साथ।
साथियो, मैंने उन्मुक्ति की कहानी 'अब डर कैसा' के पिछले दोनों हिस्सों के लिंक कहानी की अंतिम किश्त के आखिर में लगे दिए हैं। इन्हें वहां से पढ़ा जा सकता है।
nice
शुभकामनायें
धन्यवाद अनुराधा जी ।
उन्मुक्ति, कभी हम फोन पर भी बात कर सकते हैं। मेरे पास आपका email ID भी नहीं है। आप ही मुझसे संपर्क कर सकती हैं।
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