दिल्ली विश्वविद्यालय की तरफ कोई निकले तो रैगिंग, धूम्रपान और ईव टीजिंग के खिलाफ पोस्टर जगह-जगह मिल जाएंगे। मेरा आम तौर पर उस तरफ जाना नहीं होता है। पर पिछले दिनों किसी काम से कैंपस में जाने का मौका मिला तो नजर वहां लगे टंगे पोस्टरों पर स्वाभाविक रूप से गई।
हाल के दिनों में दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू में महिला छात्रों या रिसर्चरों के खिलाफ सेक्शुअल हरासमेंट के कई मामले चर्चा में आए। उनकी जांच के लिए कमिटियों के बनने की भी चर्चाएं हुईं। डीयू के एक मामले में प्रोफेसर को बचाने की चौतरफा कोशिश के बाद भी उसे बर्खास्त होने से बचाया नहीं जा सका। इसी तरह जेएनयू जैसे वैचारिक रूप से विकसित और मुक्त माहौल में भी एक मामले में हाल के दिनों में एक प्रोफेसर को निलंबित कर दिया गया है।
लेकिन इतना कतई नाकाफी है। ऐसे दो-चार मामलों के बारे में हम जान पाते हैं, पर सेक्शुअल हरासमेंट के बाकी कई मामले दबे ही रह जाते हैं। ऐसे कई मामले तो वरिष्ठ छात्रों, शोधार्थियों और शिक्षकों तक के साथ हुए है। शिकायत के बाद कमिटियां वगैरह बना दी जाती हैं, पर इसके बावजूद उन मामलों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। समय के साथ सब धुंधला होता जाता है और मामले अतीत के गर्त में खो जाते हैं।
इन बकाया मामलों की भी खोज-खबर लेने के लिए जिम्मेदार लोगों की नींद तोड़ने और हालात में बदलाव लाने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय में पिछले दिनों ऑपरेशन पिंक लिटरेचर शुरू किया गया। इससे पहले यहां हुए एक छोटे से सर्वे से यह बात सामने आई थी कि ज्यादातर पीड़ित शिकायत के लिए बने विशेष प्रकोष्ठ या कमिटी से बात करने या वहां शिकायत दर्ज कराने की बजाए अपने मित्रों और परिवार के लोगों से मदद मांगते हैं। कैंपस में हरासमेंट की घटनाओं को रोकने के लिए कोई छह साल पहले डीयू में आर्डिनेंस 15 डी बनाया गया था। लेकिन इसके बारे में भी कैंपस में जागरूकता कम है।
इन सब मसलों पर कैंपस में लोगों को सेंसिटाइज़ करने के लिए डीयू के कुछ छात्रों और शिक्षकों ने यह अभियान शुरू किया है और यह सभी के लिए खुला है, जो भी इससे जुड़ना चाहे।
हर महिला और पुरुष को एक इंसान के तौर पर देखने और उसकी मानवीय अस्मिता और गरिमा की इज्जत करने के बारे में संवेदनशील बनाए जाने की सख्त जरूरत है। अगर यह सीख कम उम्र में ही लोगों को मिले तो वे वह युवा होने पर इन मूल्यों को भी समझेंगे और उनका सम्मान करेंगे। इसके अलावा पीड़ित महिलाओं को पता हो कि अगर उनके साथ ऐसा कोई दुर्व्यवहार हो तो उन्हें इसके खिलाफ कहां शिकायत करे। डीयू की यह पहल स्वागत के लायक है।
Monday, December 7, 2009
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10 comments:
डीयू की यह पहल स्वागत के लायक है। forsure
ye ho har jagah rahaa hai kintu PAHAL ks swagat karte huye saarthak kadam uthaaye jaane kii sambhavna dikhti hai.
KADAM UTHANE WALON KO BADHAI
सतही उपाय हैं, मेरे ख्याल से तो डीयु का वूमेन ओनली कैम्पस शुरू होना चाहिए.
@ ab inconvenienti -
तब तो घरों में भी वूमन ओनली कमरे होने चाहिए, सड़कें वूमन ओनली होनी चाहिए, दफ्तर, जॉगिंग पार्क, रेल, दुकानें, .....!!! तब क्या होगा जनाब इस दुनिया का?!!! जरा सोच की आंखें पूरी खोलकर देखिए।
aise mamlon men khase `achhe` log bhi utpeedak ko bachae men lag jaate hain. medical colleege, media house, ghar, sadak..har kaheen yahee haal hai
अगर सड़क पर दुर्घटनाएं होती हैं, तो क्या सलाह यह दी जाए कि लोग सड़कों पर न निकलें? घर में चोरी होती है तो चोर / चोरी को रोकने का उपाय किया जाएगा या लोग घरों में रहना ही छोड़ देंगे? यह सलाह कि लोग घरों में रहते ही क्यों हैं जब वहां चोरी-डकैती का खतरा है... महिलाओं को इसी तरह के डर दिखा-दिखा कर हर क्षेत्र में, हर काम में सीमित कर दिया गया है। तो क्या अब उनके लिए एक अलग दुनिया ही बन जानी चाहिए, जहां पुरुषों के पैदा होने की भी मनाही हो?!!
अनुराधा जी की पोस्ट हमेशा ही बहुत विचारणीय होती है और मुद्दे पर सीधे सरोकार के कारण काफ़ी प्रभाव छोडती है. यहा भी उनका सोच पोस्ट मे और बाद मे टिप्पणी मे भी सटीक है.
समय मिले तो मेरे ब्लोग तक आये
http://hariprasadsharma.blogspot.com/
अच्छी जानकारी। धन्यवाद।
कितना अजीब है यह सोचना कि महिलाओं के लिए अलग कैंपस, अलग स्कूल, अलग हॉस्पिटल, अलग मोहल्ले, ...आदि इत्यादि बनवा दिया जाए। यही वह सोच है जो कभी सुधार को सही दिशा में नहीं ले जाती। शोषण खत्म करने की बजाए या शोषक को सबक सिखाने की बजाए यह सोचना और चाहना कि शोषित को ही किनारे कर दिया जाए...मैं समझती हूं कि अपराध है।
और हां, अनुराधा जी की बात पर गौर करें जरा।
कितना अजीब है यह सोचना कि महिलाओं के लिए अलग कैंपस, अलग स्कूल, अलग हॉस्पिटल, अलग मोहल्ले, ...आदि इत्यादि बनवा दिया जाए। यही वह सोच है जो कभी सुधार को सही दिशा में नहीं ले जाती। शोषण खत्म करने की बजाए या शोषक को सबक सिखाने की बजाए यह सोचना और चाहना कि शोषित को ही किनारे कर दिया जाए...मैं समझती हूं कि अपराध है।
और हां, अनुराधा जी की बात पर गौर करें जरा।
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