जब से पत्रकारिता की इस मायावी दुनिया में कदम रखा है एक स्त्री होने के नाते बहुत सारे अच्छे बुरे और बेतुके अनुभव हुए हैं लेकिन एक बात जो नर्विवाद रूप से सामने आयी है वो ये पत्रकारिता अब महज़ बिज़नेस बनकर रह गया है जहां ईमान की बातें करना अपना मखौल उड़वाना है , जिसके तहत कई बार मैनें भी अपना मज़ाक उड़वाया है। ये एक मृगमरीचिका बन गया है। दूर से देखने में सबकुछ सच सा भ्रम पैदै करता है लेकिन जब हम सच से बावस्ता होते हैं तो उस मृगमरीचिका की स्वर्णमयी जलराशि, रूखे बेजान चुभने वाले बालू में तब्दील हो जाती है।
एक ख़बर जो सच से कोसों दूर होती हुई भी सच है। क्योकि आज के ख़बरिया चैनल वही दिखाते हैं जो सच है।
पढा था दुष्यन्त कुमार को-
कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता ।
एक पत्थर तो तबीयत से उछालों यारों ।।
आप अपनी तबीयत से पत्थर उछाल-उछाल कर थक जाएंगे लेकिन सूराख है कि होने का नाम ही नहीं लेगा और ऐसे न जाने कितने करोड़ो पत्थरों को उछालने के बाद अंतत इस खोखली व्यावसायिकता का हिस्सा बनने पर मजबूर हो जाएंगे। इस भीड़ का मुसाफिर बनना शायद एक स्त्री पत्रकार के लिए ज़्यादा सहज हो जाता है। लेकिन ये सहजता कब तक स्वीकार्य होगी। प्रश्न जटिल है लेकिन सोचने योग्य..........
Tuesday, May 20, 2008
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6 comments:
सचमुच सोचने की बात तो है लेकिन कोशिश करते रहना ही जिंदगी है,वो आपको करनी होगी.
कम से कम जिस तरह से नॉएडा डबल मुर्डर काण्ड के पीछे मीडिया हाथ धोकर पड़ा है उससे आपकी बात साबित होती है ,जिम्मेदारी भी इस पेशे का एक अंग है ,हर बात को सच की लकीर से वाजिब ठहराना अपनी कमियों को छुपाना है......ये सच बोलने वाले इतने खरे नही है....... अभी मीडिया को किसी पहरेदार ओर आत्मनिरीक्षण की जरुरत है ......
"पत्रकारिता अब महज़ बिज़नेस बनकर रह गया है" इस से क्या आप यह कहना चाहती हैं कि पहले यह बिजनेस नहीं था? क्या पहल लोग इस में धन कमाने की इच्छा लेकर नहीं जाते थे? इतना कहा जा सकता है कि अन्य बिजनेस की तरह इस में भी ख़बर की गुणवत्ता पैसे कि भेंट चढ़ गई है. अब ख़बर दी नही जाती, बनाईं जाती है. जो ख़बर दी जानी चाहिए, छुपाई जाती है. और यह सब पैसे के बल पर होता है.
सुरेश जी
एक समय था जब पत्रकारिता सच को सामने रखने के लिए थी।पेट की भूख उस पत्रकारिता के रास्ते में रोड़ा नहीं बनती थी। माना कि समय बदल गया है और आज हर चीज़ पैसै के लिए और पेट की भूख के लिए की जा रही है। लेकिन ख़बरों का सौदा करनेवाले इन दिग्गजों का पेट इतना बड़ा हो गया है कि भरने का नाम ही नहीं लेता।
सही कहा है । लोकिन आप जैसे जिम्मेदार पत्रकार ही एक छोडासा ही सही सूराख आसमान में जरूर करेगे चाहे पत्थर कितने ही लगें ।
smriti ji namaskar apka blog dekha acha laga ek request hai ki bhartiye hone mein hamesha garva kariye
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