- सीमा स्वधा
सीमा स्वधा को मैं सिर्फ इस कविता के जरिए जानती हूं। लेकिन जब औरत से जुड़ी कोई भी बात किसी भी रूप में आए तो उसे आपसे साझा किए बिना नहीं रहा जाता। अस्तु, ये कविता...
औरत
धीरे-धीरे उतरती है
मर्द की जिंदगी में
और शुमार हो जाती है
आदत की तरह.
कभी खौलती है
वजूद में/चाय की तरह
कभी बिखरती है/हर कश के साथ
धुयें की मानिंद.
बहती है कभी रंगों में
जिंदगी की सच्चाई बन
दहक-लाल-गर्म.
थरथराती है कभी/सांसों में
इच्छाओं की
ज्वार भाटा बन.
गोया
पत्नी वजूद नहीं
एक वस्तु हो/जिसे गढा हो
भले ही इश्वर ने
पर/इतना लचीलापन भी जरूरी है
कि मर्द ढाल सके
वक्त-बेवक्त/अपनी सुविधा
और कायदे के सांचे में.
Sunday, July 19, 2009
Friday, July 17, 2009
चोखेर बाली की चर्चा "दस्तक" में
ब्लागिंग का जमाना है. यहाँ तक की प्रिंट-मीडिया भी अब ब्लागर्स को महत्व देने लगा है. कई अख़बारों ने तो पाठकों के पत्र की जगह ब्लाग-कोना की ही शुरुआत कर दी है. नि:संदेह इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए. व्यंग्यकार सूर्य कुमार पाण्डेय की लिखी पंक्तियाँ उधृत कर रही हूँ-"अब तो हालत यह है कि अखबारों तक ने अपने पाठकों के पन्नों वाली स्पेस को इन ब्लागर्स के नाम आवंटित कर दिया है। दिनोदिन ब्लागियों की फिगर में इजाफा हो रहा है। बिना डाक टिकट, लेटरबाक्स के ही चिट्ठे लिखे जा रहे हैं। जवाब आ रहे हैं। जिनके पास एक अदद कंप्यूटर और नेट की सुविधा उपलब्ध है, वे इस चिट्ठाकारिता में अपना योगदान करने को स्वतंत्र हैं। कर भी रहे हैं। अब अंकल एसएमएस के बिग ब्रदर बाबू ब्लागानंद प्रकट हो चुके हैं। उनकी कृपा से बबुआ लव लेटरलाल, चाचा चिट्ठाचंद और पापा पोथाप्रसाद समेत फैमिली के टोटल मेंबर्स की लाइफ सुरक्षित है। सो चिट्ठी बिटिया की भी।" तो आप भी इंतजार कीजिये की कब कौन अख़बार-पत्रिका आपकी पोस्ट को रचनाओं के रूप में प्रकाशित करती है. फ़िलहाल लखनऊ से प्रकाशित पाक्षिक पत्रिका "दस्तक टाईम्स" (संपादक-राम कुमार सिंह, 215-रूपायन, नेहरू एन्क्लेव, गोमती नगर, लखनऊ)ने 15 जुलाई, 2009 के अंक में ब्लॉग-भारत स्तम्भ के तहत "चोखेर बाली" पर प्रकाशित मेरे लेख "ईव-टीजिंग और ड्रेस कोड" को स्थान दिया है..आभार !! आकांक्षा यादव
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आकांक्षा यादव,
ब्लॉग चर्चा
Monday, July 13, 2009
जब सरकार ही करवाती हो कौमार्य परीक्षण तो कैसे कायम होगा जेन्डर बैलेंस
Govt holds virginity test for MP bride
इसे हमारे समय की विडम्बना ही कहा जाएगा कि केन्द्र सरकार एक तरफ तो जेन्डर बैलेंस पर ज़ोर दे रही है वहीं दूसरी ओर मध्यप्रदेश सरकार पिछड़ेपन की ऐसी मिसालें कायम कर रही है कि क्या कहिए।ऊपर दिए लिंक की खबर बताती है कि भोपाल मे गत 26 जून को गरीब कन्याओं के सामूहिक विवाह के समय मंडप मे जाने से पहले सभी 151 दुल्हनों के वर्जिनिटी टेस्ट कराए गए।
इस खबर के बाद मेरी दो मूल आपत्तियाँ हैं ।सरकार का अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने क गलत तरीका और दूसरा सरकार का सामाजिक बदलाब और सामाजिक मुद्दों के प्रति दकियानूसी नज़रिया !
इस खबर मे सबसे ज़्यादा हैरान करने वाली बात है भोपाल के डिस्ट्रिक्ट कलक्टर की । वे मानते हैं कि क्योकि यह
मामला पैसे से जुड़ा है इसलिए कुछ महिलाएँ इसका फायदा उठाती हैं।इसलिए यह सावधानी बरती गयी है।
अब इस घटना और इस स्टेट्मेंट का पोस्ट मार्टम किया जाए ज़रा कि क्या निकल कर आता है।
मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के अंतरगत सामूहिक विवाह होते हैं जिसमे शायद प्रति विवाहित जोड़ा 6.5 हज़ार रुपए दिए जाते हैं।किसी के लिए वैवाहिक जीवन की शुरुआत करने मे यह रकम कितनी बड़ी है यह समझदारों को दिखाई ही दे रहा होगा।लेकिन व्यापक रूप से देखा जाए तो सरकार की ओर से करोड़ों रुपए इस नाम पर निकलता है।कन्यादान मुख्यमंत्री कर रहे हैं तो निश्चित रूप से वर को सौंपी जाने वाली दुल्हन की गारंटी भी उन्हे ही लेनी पड़ेगी।वर्ना उनकी बदनामी होगी{ जैसा कि पिछले साल हुआ था बकौल डिस्ट्रिकट कलक्टर कि एक महिला ने विवाह मंड्प मे ही शिशु को जन्म दे दिया था।मानो नौ माह की गर्भवती विवाह करने वाले को दिखाई ही नही दी थी, खैर , उसे भी अपने आने वाले शिशु के लिए आर्थिक सामाजिक सुरक्षा का आश्वासन होता तो वह यहाँ 6,500 रुपए लेने नही आती}
सो कुल मिलाकर जब सरकार बेचारी महिलाओं पर इतना उपकार कर रही है और कुछ लड़कों के सर ऐसी गरीब बेसहाराओं की ज़िम्मेदारी मढ कर अपने फर्ज़ से मुक्ति पा रही है तो उसका पूरा दायित्व बनता है कि दहेज -वहेज न सही कम से कम विर्जिनिटी की तो गारंटी ले!!
अब आय जाए कुछ महिलाओं द्वारा इसका फायदा उठाने की बात। भई , अब जब आप भूखे का पेट भरने की बेसिक ज़िम्मेदारी भी पूरी नही करेंगे तो स्त्री के आगे 6.5 हज़ार की ऐसी बड़ी रकम हथियाने की और क्या तरकीब बची रह जाती है।कोई सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, नौकरी की गारंटी, कुछ बेरोज़गारी भत्ता उन्हे न मिलता हो तो अनपढ गरीब महिला ऐसे विवाहों का ही तो फायदा उठाएगी । क्यों !! इस रकम से उसकी सात पुश्तें पल जाने वाली जो हैं !जिस देश मे स्त्री 10 - 50 रुपए मे शरीर बेचने को मजबूर हो अपना पेट भरने के लिए वहाँ जीवन मे एक बार ऐसा विवाह करके कम से कम वह चन्द दिन आर्थिक अभावों के बिना काट सकती है{निश्चित रूप से चतुर सरकार इस बात का तो खयाल रखती ही होगी कि एक ही महिला बार बार , हर साल ऐसा फायदा उठाने न पहुँच जाती हो}
पहले आप किसी को मजबूर बनाएँ और फिर उसकी मजबूरी को अपराध की संज्ञा भी दें तो फिर उस मजबूरी की , माने अपराध की सज़ा भी दें या कम से कम उसे मजबूरी के और गहरे दल दल मे धँसा दें !!
किसी गरीब कन्या के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण , शिक्षा, बेरोज़गार होने की हालत मे मासिक भत्ता या नौकरी की व्यवस्था ....जैसे हल ही कामयाब हल हो सकते हैं न कि उनका विवाह करा के उनकी ज़िम्मेदारी किसी के सर मढ देना ताकी वे जीवन भर लाचारों की तरह किसी के चूल्हे फूंकती रहे और झापड़ खाती रहें।
सरकार ही जहाँ वर्जिनिटी टेस्ट कराती हो वहाँ अशिक्षित , गरीब , आम जनता तो क्या समझदारों को भी कौमार्य के भूत से मुक्त नही किया जा सकेगा।यह पिछली सदियों मे जाने का नही इस सदी को पिछले भूतों से मुक्त करने का समय है। यह कौमार्यता के मिथों को तोड़ने का समय है या उसे मज़बूत करने का ?और यह स्थिति तब है जब कि विज्ञान ही साबित कर चुका है कि हाइमेन का भंग होना प्रथम सम्भोग से ही नही होता इसके अन्य कारण भी हो सकते हैं जैसे कि साइकलिंग करना ,जिमनास्टिक्स , तैराकी जैसी शारीरिक मशक्कत वगैरह ।
सरकारी नौकरियों , ऊंचे प्रशासनिक पदों और मंत्री बनने के लिए यह शर्त अनिवार्य हो जानी चाहिए कि आपने जीवन मे समाजशास्त्र का अध्ययन किया हो और कुछ सोशल वर्क किया हो।जितना ऊंचा पद हो समाज के बीच काम करने और अध्ययन करने के अनुभव को बढा देना चाहिए। जिन लोगों की बुद्धि इतनी भ्रष्ट हो कि उन्हे सामाजिक समस्याओं के निदान के लिए ऐसे भेड़- बकरी वाले हल सूझते हों उनका ऐसे पद पाना और उन पदों पर बने रहने देना हमारी बद किस्मती ही है।
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Wednesday, July 8, 2009
LGBT-एक अदृशय जमात के हक मे
समलैंगिगकता याने गे-लेस्बियन संबंधो की शब्दावली मेरे जीवन मे पहले-पहल राही मासूम रज़ा की किताब "कटरा बी आरजू " , और श्री-लाल शुक्ल की "राग दरबारी " को पढने के बाद आयी थी, तकरीबन बीस बरस पहले। "कटरा बी आरजू" को पढ़कर भय और "राग-दरबारी" के "मास्साब " को लेकर दैन्य भाव एक किशोर मन मे जागा था। बाद के सालो मे "लियानार्दो दी विंची" और फ़िल्म रोल के आविष्कारक "जॉर्ज ईस्ट्मेन" और कई दूसरे ख्यातीलब्ध लोगो के गे होने का पता चला। और रोचेस्टर सिटी मे ईस्ट्मेन का घर बनाम संग्रहालय भी देखने का मौका आया. "विंची" और ईस्ट्मेन दोनों के बारे मे कुछ प्रचलित विश्वास भी है की दोनों परफेक्टनिस्ट थे, और कुछ दर्जे तक आत्म-मोहित भी, और इसीलिये औरतों के बजाय मर्द उन्हें ज्यादा आकर्षित करते थे।
बाद के बरसो मे कई लोगो को देखकर अक्सर उनके "गे-पने" को लेकर शक होता था, पर मर्यादा के चलते कभी पूछा नही। गे-लेस्बियन संबंधो और हाशिये पर फेक दी गयी सेक्सुअल अस्मिता और ३७७ का ज़िक्र "मंटो और चुगताई " की कहानियों मे पढा " पर किसी को इसका शिकार होते हुए देखने की कोई स्मृति नही है।
मेरा परिचय और दोस्ती "गे-लेस्बियन " लोगो से कोर्नेल कैम्पस मे हुयी और इन संबंधो पर खुली बहसे भी हुयी। इत्तफाकन इस दोस्ती की शुरुआत एक हिन्दुस्तानी लड़की से हुयी, जिससे हिन्दुस्तान, नारी विमर्श और राजनीती पर बात शुरू हुयी, और यकीनन उसकी तीक्ष्ण बुद्धी और सामाजिक संवेदनशीलता दोनों ने मुझे प्रभावित किया। एक भरोसे की दोस्ती के बाद उन्होंने मुझे अपने लेस्बियन होने के बारे मे बताया और एक खुले और सम्मान भरे महाल मे हमने इस पर कई बहसे की। इन बहसों मे कई चीजे मुझे पता चली। एक ये की जैसे ब्राहमण को दलित का दर्द नही दिखता, अपमान नही दिखता वैसे ही द्वीलिंगी लोगो के लिए "गे" अदृशय है। और एक गे ही दूसरे गे" को पहचान सकता है। गे-लेस्बियन कम्युनिटी मे इसे रेडार की तर्ज़ पर "गेडार" कहा जाता है। बाद के दौर मे जब कभी सड़क पर चलते हम दोनों साथ होते तो मैं लोगो को देखकर अंदाजा लगाने की कोशिश करती की कौन गे है.... और मेरी मित्र मेरे गेडार को रेटिंग देती। इस बात से ये अनुभव मुझे वाकई सिखा गया की एक ऐसे समाज मे जह्ना आप बहुसंख्यक है, या फ़िर स्वीकृत व्यवस्था का हिस्सा है, आपकी अपनी ज्ञानेंद्रिया और समझ पर भी अल्पसंख्यक अस्मिताओं को देखने के लिए परदे पड़ जाते है।
हिन्दुस्ताने गे जो मेरे मित्र बने और उनकी वजह से कई दूसरे गे लोगो से जो बातचीत हुयी. उसने मेरे सामने दो सवाल खड़े किए की क्या ये सिर्फ़ पश्चिम का अनुकरण है, और क्या मौजूदा समलैंगिक दावेदारी का कोई भारतीय कंटेक्स्ट है? तमाम लोगो की तरह मैं भी मानती थी की इसका इलाज़ सम्भव है। तीसरी दुविधा मेरे भीतर नही थी कि जानवर इसका अपवाद है, क्योंकि थोड़ी बहुत जानकारी रिसर्च की थी। आज पलटकर सोचती हूँ तो मेरा मन अपने उन मित्रो के लिए थोड़ी और इज्ज़त से भर जाता है की उन्होंने मेरे अटपटे और कुछ हद तक एक खाके मे फिट सवालों का बड़े धैर्य से ज़बाब दिया.
बहुत ज़द्दोजहद के बाद एक समझ बनी है कि एक मायने मे गे एक अदृश्य जमात है, जिसे बाकी लोग देखना नही चाहते, सुनना नही चाहते और उनका वजूद परिहास , घृणा, और शर्मिन्दगी का प्रतीक बन जाता है. LGBT ग्रुप एक साथ दो अंतर्विरोधों का सामना करता है, लगातार। एक उस इच्छा का कि उनके वजूद को सम्मान जनक जगह मिले, वों अदृशय जमात स्वीकृत हो । गे-परेड के आयोजन को इसी सन्दर्भ मे देखना होगा.
दूसरी तरफ़ परिवार और समाज और कानून की तरफ़ से द्वीलिंगी खांचे मे फिट होने का दबाव, लगातार उनके अदृशय होने की शर्ते बुनता है। कुछ हद तक इन सभी ने मिलकर hidden symbolism को बढावा दिया। इनमे से कुछ जानकारियाँ, दाहिने कान मे बाली, सतरंगी छाता, और हर शहर, कसबे मे कुछ जगहे, जहाँ लोग मिलते है। एक उदाहरण दिल्ली का कंबन पार्क है, पालिका मे। जाने कितनी बार वहाँ जाना हुया होगा मेरा पर मेरे लिए इस अदृशय जमात को देखना सम्भव नही था। इस लिहाज़ से बहुत से गे-मित्रो ने अपने-अपने symbols हर धर्म मे खोजे हुए है, अगर यह्ना लिखा जाय तो शायद बहुत लोग अपने विश्वासों को लेकर आहत हो। सो ये सवाल कुछ हद तक पाठको पर उनके लिए जो पूर्वाग्रही नही है , यही छोड़ दिया जाय। अगर कमजोर लोगो का और सताए हुए लोगो का संबल है आस्था है, तो गे-लोगो को भी यंहा संबल ढूढने का, अपने रोल मॉडल ढूँढने का हक है।
दूसरा, सवाल जिसे पहलू वाले चंद्रभूषण जी ने उठाया है वों गे आन्दोलन के आक्रामक रेडिकलिज्म के बोध के साथ जुड़ा हुआ है, और आमतौर पर समलैंगिक होना, ऊंचे तबकों के कई दूसरे शौकों- मसलन ड्रग्स, रैश ड्राइविंग और रेव पार्टीज के समकक्ष दिखना है। मेरा मानना है कि जिस तरह का दमन और दबाव इन लोगो पर है, बिना संगठित हुए और बिना आक्रमक हुए उनका काम नही चलेगा। इस आन्दोलन की ज़रूरत और दूनिया मे जनतंत्र का आज का ढांचा दोनों इसके लिए मुफीद माहौल बनाते है। तमाम दबे-कुचलों के आन्दोलन चाहे वों दलित आन्दोलन हो, नारी आन्दोलन हो, या नक्सल आन्दोलन और दूनिया भर मे फैले अराजक, आक्रमक आन्दोलन उनकी अपनी जमीन है, और अपने भटकाव भी है। गे-आन्दोलन भी इन्ही सब का शिकार होगा, आखिरकार ये विसंगति तो मानव सभ्यता की है, गे इससे कैसे बचेंगे?
कुछ पोजीटिव चीजे जो गे-परेड को लेकर एक बंद समाज मे उभरेंगी, वों है कि माता-पिता "मेल बच्चों" के योन शोषण की संभावनों के लिए शिक्षित हो जायेंगे। और शायद कुछ बच्चे इसका शिकार होने से बच जाय। कुछ स्त्रिया भी बच जाय, गे पुरुषो के साथ शादी के बंधन मे बंधने से। और शायद कुछ पुरूष भी बच जाय, जबरदस्ती और अनजाने मे हुयी शादियों से। दूसरी बात गे-विजीबिलिटी शायद कुछ हद तक दो जेंडर के दो ध्रुवो पर टिके विभाजन को ख़त्म कर दे, जैसे कौन कैसे कपडे पहने? कैसी चाल ढाल रखे, पुरूष रोये नही और स्त्रीयों के लिए रोना ही एक तरीका बचे अपनी मर्जी चलाने का. शायद मनुष्य पर थोपे गए रोज़ ब-रोज़ के ये ज़बरदस्ती के मूल्य टूट जाय, थोड़ी सी साँस लेने की जगह सबको मिले।
और तीसरी बात, की शायद वों जगह हमारे समाज मे थोड़ी सी और बढ़ जाय जह्ना दो विपरीत लिंगी सहज दोस्त बन सके, सामाजिक दबाव न झेले, और अपनी लैंगिक पहचान से ऊँचे उठकर एक इंसान की तरह एक दूसरे के साथ बर्ताव कर सके। हर महिला और पुरूष को विपरीत लिंगी दोस्तों को भाई-दीदी/कजिन मे तब्दील न करना पड़े। कुछ गे-पुरूष मित्रो की मजाक मे कही बात की "यू आर सफ़र विद मी" कुछ हद तक सही भी है, की ये दोस्ती की उन संभावनाओं को जन्म देती है, जह्ना इस बात का डर नही रहता की कब कौन विपरीत लिंगी मित्र unintended/ undesired lover ya rapist की तरह अचानक से अवतरित हो जाय। इस बात का कतई ये मतलब नही है की "heterosexual " मर्द और औरते अपनी लैंगिक पहचान से ऊपर नही उठ सकते या विपरीत लिंगी दोस्तिया उनके लिए नही है। कुछ उठ जाते है, कुछ हमेशा वही डूबे रहते है।
गे लोगो पर लिखना और उनके बारे मे मेरे लिखने का मकसद भी सिर्फ़ इतना है कि कुछ पूर्वाग्रहों की बुनियाद हिल सके, और उन्हें हम एक मनुष्य की गरिमा के साथ स्वीकारे। एक documentary "khush" हिन्दुस्तानी सन्दर्भ को समझने के लिए अच्छी है, और कुछ किताबे भी जिनमे हिन्दुस्तानी समलेंगिको ने अपने अनुभव समेटे है। मेरे लिए ख़ुद जियो, औरो को उनके हिसाब से जीनो दो ही एक बेहतर अप्प्रोअच है, और इस दूनिया मे इतनी विषमताये है, कुछ प्रकृति की और कुछ मानव की बनायी हुयी। फ़िर भी हम जाती की, लिंग की, भूगोल की, सीमाओं को तोड़ते हुए एक दूसरे की तरफ़ हाथ बढाते है। प्रेम होता है, दोस्ती होती है, मिलजुल कर काम करते है। इन्ही बहुत सी विषमताओं मे से एक गे या लेस्बियन होना भी है
बाद के बरसो मे कई लोगो को देखकर अक्सर उनके "गे-पने" को लेकर शक होता था, पर मर्यादा के चलते कभी पूछा नही। गे-लेस्बियन संबंधो और हाशिये पर फेक दी गयी सेक्सुअल अस्मिता और ३७७ का ज़िक्र "मंटो और चुगताई " की कहानियों मे पढा " पर किसी को इसका शिकार होते हुए देखने की कोई स्मृति नही है।
मेरा परिचय और दोस्ती "गे-लेस्बियन " लोगो से कोर्नेल कैम्पस मे हुयी और इन संबंधो पर खुली बहसे भी हुयी। इत्तफाकन इस दोस्ती की शुरुआत एक हिन्दुस्तानी लड़की से हुयी, जिससे हिन्दुस्तान, नारी विमर्श और राजनीती पर बात शुरू हुयी, और यकीनन उसकी तीक्ष्ण बुद्धी और सामाजिक संवेदनशीलता दोनों ने मुझे प्रभावित किया। एक भरोसे की दोस्ती के बाद उन्होंने मुझे अपने लेस्बियन होने के बारे मे बताया और एक खुले और सम्मान भरे महाल मे हमने इस पर कई बहसे की। इन बहसों मे कई चीजे मुझे पता चली। एक ये की जैसे ब्राहमण को दलित का दर्द नही दिखता, अपमान नही दिखता वैसे ही द्वीलिंगी लोगो के लिए "गे" अदृशय है। और एक गे ही दूसरे गे" को पहचान सकता है। गे-लेस्बियन कम्युनिटी मे इसे रेडार की तर्ज़ पर "गेडार" कहा जाता है। बाद के दौर मे जब कभी सड़क पर चलते हम दोनों साथ होते तो मैं लोगो को देखकर अंदाजा लगाने की कोशिश करती की कौन गे है.... और मेरी मित्र मेरे गेडार को रेटिंग देती। इस बात से ये अनुभव मुझे वाकई सिखा गया की एक ऐसे समाज मे जह्ना आप बहुसंख्यक है, या फ़िर स्वीकृत व्यवस्था का हिस्सा है, आपकी अपनी ज्ञानेंद्रिया और समझ पर भी अल्पसंख्यक अस्मिताओं को देखने के लिए परदे पड़ जाते है।
हिन्दुस्ताने गे जो मेरे मित्र बने और उनकी वजह से कई दूसरे गे लोगो से जो बातचीत हुयी. उसने मेरे सामने दो सवाल खड़े किए की क्या ये सिर्फ़ पश्चिम का अनुकरण है, और क्या मौजूदा समलैंगिक दावेदारी का कोई भारतीय कंटेक्स्ट है? तमाम लोगो की तरह मैं भी मानती थी की इसका इलाज़ सम्भव है। तीसरी दुविधा मेरे भीतर नही थी कि जानवर इसका अपवाद है, क्योंकि थोड़ी बहुत जानकारी रिसर्च की थी। आज पलटकर सोचती हूँ तो मेरा मन अपने उन मित्रो के लिए थोड़ी और इज्ज़त से भर जाता है की उन्होंने मेरे अटपटे और कुछ हद तक एक खाके मे फिट सवालों का बड़े धैर्य से ज़बाब दिया.
बहुत ज़द्दोजहद के बाद एक समझ बनी है कि एक मायने मे गे एक अदृश्य जमात है, जिसे बाकी लोग देखना नही चाहते, सुनना नही चाहते और उनका वजूद परिहास , घृणा, और शर्मिन्दगी का प्रतीक बन जाता है. LGBT ग्रुप एक साथ दो अंतर्विरोधों का सामना करता है, लगातार। एक उस इच्छा का कि उनके वजूद को सम्मान जनक जगह मिले, वों अदृशय जमात स्वीकृत हो । गे-परेड के आयोजन को इसी सन्दर्भ मे देखना होगा.
दूसरी तरफ़ परिवार और समाज और कानून की तरफ़ से द्वीलिंगी खांचे मे फिट होने का दबाव, लगातार उनके अदृशय होने की शर्ते बुनता है। कुछ हद तक इन सभी ने मिलकर hidden symbolism को बढावा दिया। इनमे से कुछ जानकारियाँ, दाहिने कान मे बाली, सतरंगी छाता, और हर शहर, कसबे मे कुछ जगहे, जहाँ लोग मिलते है। एक उदाहरण दिल्ली का कंबन पार्क है, पालिका मे। जाने कितनी बार वहाँ जाना हुया होगा मेरा पर मेरे लिए इस अदृशय जमात को देखना सम्भव नही था। इस लिहाज़ से बहुत से गे-मित्रो ने अपने-अपने symbols हर धर्म मे खोजे हुए है, अगर यह्ना लिखा जाय तो शायद बहुत लोग अपने विश्वासों को लेकर आहत हो। सो ये सवाल कुछ हद तक पाठको पर उनके लिए जो पूर्वाग्रही नही है , यही छोड़ दिया जाय। अगर कमजोर लोगो का और सताए हुए लोगो का संबल है आस्था है, तो गे-लोगो को भी यंहा संबल ढूढने का, अपने रोल मॉडल ढूँढने का हक है।
दूसरा, सवाल जिसे पहलू वाले चंद्रभूषण जी ने उठाया है वों गे आन्दोलन के आक्रामक रेडिकलिज्म के बोध के साथ जुड़ा हुआ है, और आमतौर पर समलैंगिक होना, ऊंचे तबकों के कई दूसरे शौकों- मसलन ड्रग्स, रैश ड्राइविंग और रेव पार्टीज के समकक्ष दिखना है। मेरा मानना है कि जिस तरह का दमन और दबाव इन लोगो पर है, बिना संगठित हुए और बिना आक्रमक हुए उनका काम नही चलेगा। इस आन्दोलन की ज़रूरत और दूनिया मे जनतंत्र का आज का ढांचा दोनों इसके लिए मुफीद माहौल बनाते है। तमाम दबे-कुचलों के आन्दोलन चाहे वों दलित आन्दोलन हो, नारी आन्दोलन हो, या नक्सल आन्दोलन और दूनिया भर मे फैले अराजक, आक्रमक आन्दोलन उनकी अपनी जमीन है, और अपने भटकाव भी है। गे-आन्दोलन भी इन्ही सब का शिकार होगा, आखिरकार ये विसंगति तो मानव सभ्यता की है, गे इससे कैसे बचेंगे?
कुछ पोजीटिव चीजे जो गे-परेड को लेकर एक बंद समाज मे उभरेंगी, वों है कि माता-पिता "मेल बच्चों" के योन शोषण की संभावनों के लिए शिक्षित हो जायेंगे। और शायद कुछ बच्चे इसका शिकार होने से बच जाय। कुछ स्त्रिया भी बच जाय, गे पुरुषो के साथ शादी के बंधन मे बंधने से। और शायद कुछ पुरूष भी बच जाय, जबरदस्ती और अनजाने मे हुयी शादियों से। दूसरी बात गे-विजीबिलिटी शायद कुछ हद तक दो जेंडर के दो ध्रुवो पर टिके विभाजन को ख़त्म कर दे, जैसे कौन कैसे कपडे पहने? कैसी चाल ढाल रखे, पुरूष रोये नही और स्त्रीयों के लिए रोना ही एक तरीका बचे अपनी मर्जी चलाने का. शायद मनुष्य पर थोपे गए रोज़ ब-रोज़ के ये ज़बरदस्ती के मूल्य टूट जाय, थोड़ी सी साँस लेने की जगह सबको मिले।
और तीसरी बात, की शायद वों जगह हमारे समाज मे थोड़ी सी और बढ़ जाय जह्ना दो विपरीत लिंगी सहज दोस्त बन सके, सामाजिक दबाव न झेले, और अपनी लैंगिक पहचान से ऊँचे उठकर एक इंसान की तरह एक दूसरे के साथ बर्ताव कर सके। हर महिला और पुरूष को विपरीत लिंगी दोस्तों को भाई-दीदी/कजिन मे तब्दील न करना पड़े। कुछ गे-पुरूष मित्रो की मजाक मे कही बात की "यू आर सफ़र विद मी" कुछ हद तक सही भी है, की ये दोस्ती की उन संभावनाओं को जन्म देती है, जह्ना इस बात का डर नही रहता की कब कौन विपरीत लिंगी मित्र unintended/ undesired lover ya rapist की तरह अचानक से अवतरित हो जाय। इस बात का कतई ये मतलब नही है की "heterosexual " मर्द और औरते अपनी लैंगिक पहचान से ऊपर नही उठ सकते या विपरीत लिंगी दोस्तिया उनके लिए नही है। कुछ उठ जाते है, कुछ हमेशा वही डूबे रहते है।
गे लोगो पर लिखना और उनके बारे मे मेरे लिखने का मकसद भी सिर्फ़ इतना है कि कुछ पूर्वाग्रहों की बुनियाद हिल सके, और उन्हें हम एक मनुष्य की गरिमा के साथ स्वीकारे। एक documentary "khush" हिन्दुस्तानी सन्दर्भ को समझने के लिए अच्छी है, और कुछ किताबे भी जिनमे हिन्दुस्तानी समलेंगिको ने अपने अनुभव समेटे है। मेरे लिए ख़ुद जियो, औरो को उनके हिसाब से जीनो दो ही एक बेहतर अप्प्रोअच है, और इस दूनिया मे इतनी विषमताये है, कुछ प्रकृति की और कुछ मानव की बनायी हुयी। फ़िर भी हम जाती की, लिंग की, भूगोल की, सीमाओं को तोड़ते हुए एक दूसरे की तरफ़ हाथ बढाते है। प्रेम होता है, दोस्ती होती है, मिलजुल कर काम करते है। इन्ही बहुत सी विषमताओं मे से एक गे या लेस्बियन होना भी है
Sunday, July 5, 2009
देवियों सिंहासन छोड़ो!
सिंहासन खाली हो रहे हैं. जिन सिंहासनों पर आदर्श भारतीय स्त्रियां(भली स्त्रियां) विराजमान हुआ करती थीं वह अब लगभग खाली है. समाज के पैरोकार चिंता में हैं कि समाज से भली औरतें गायब हो रही हैं. कैसे बचेगा समाज, कैसे बचेंगे परिवार? सवाल बड़े हैं, उनकी चिंताएं भी जायज हैं लेकिन क्या करें, अब भलमनसाहत से चिढ़ सी होने लगी है. भले होने को लेकर जिस तरह की धारणाएं समाज में व्याप्त हैं वे कहीं न कहीं खुद को अंदर ही अंदर खत्म करने, अपनी इच्छाओं को मारने, दूसरों के सुख के लिए कुर्बान होने, बुरे को देखकर, सहकर भी चुप रहने के रूप में सामने आती हैं. बड़ी भली है फलाने की बहू, कुछ भी कह लो, मजाल है चूं करे. फलाने की लड़की तो गऊ है कभी आंख उठाकर चलते नहीं देखा. आजकल ऐसी लड़कियां मिलती कहां हैं? जैसे जुमले चुभते हुए से जान पड़ते हैं. मानो अच्छाई न हुई चाबुक हो गई सटासट पीठ पर बरस रहा है और हम अच्छे होने के कारण बस मुस्कुरा रहे हैं कि नहीं, जी कोई दर्द नहीं हो रहा है. अब यह सलीब उठाई नहीं जाती. लड़कियों ने कमर सीधी की है, आंखें मिलाना शुरू किया है. कोई भी आदेश यूं ही नहीं मान लेतीं. तर्क मांगती हैं. यहीं से रिश्तों में दरार आती है, परिवार नाम की संस्था की नींव धसकने लगती है. ये औरतें बुरी औरतें हैं. इन्होंने सिंहासन छोड़ दिया है. देवी होने से इनकार कर दिया है।फिर भी शाइनी आहूजा की पत्नी अनुपमा जैसी भली औरतें हैं अभी समाज में उस सिंहासन की दावेदारी के लिए जो कानून, साक्ष्य, गुनाह के इकरारनामे के बावजूद अपने देवता पति में पूरी आस्था जता रही हैं. यानी सिंहासन को पूरी तरह खाली होने में वक्त लगेगा अभी.
Monday, June 29, 2009
आओ उतारें दिमाग के जाले..
सूरत, पालमपुर, दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, छतरपुर....ये शहरों के नाम नहीं हैं। इन नामों से दर्द रिसता है आजकल। एक...दो...तीन...चार...पांच...सिलसिला जारी है. ईव टीजिंग, रेप, मर्डर... जिंदा जला देना, मारकर फेंक देना. एक ख़ौफ खत्म नहीं होता, एक का दर्द थमता नहीं कि दूसरी घटना तैयार. जिस देश में हर 27 मिनट में एक महिला रेप विक्टिम हो उस देश की स्त्रियों की सुरक्षा के बारे में आसानी से सोचा जा सकता है.
अब मुद्दे को $जरा पलटकर देखते हैं। लड़कियों का आकाश काफी बड़ा हो रहा है। लड़कियों को ढेर सारी आजादी मिल रही है. हर क्षेत्र में उनका वर्चस्व बढ़ता जा रहा है. हर परीक्षा में वे बाजी मार रही हैं. इससे बेहतर और भला क्या होगा?
एक बार फिर मामले का रुख़ पलटते हैं और देखते हैं समाज की प्रतिक्रिया - लड़कियों के साथ होने वाली घटनाओं के लिए वे खुद जिम्मेदार हैं. क्योंकि
- वे बेवक्त घर के बाहर घूमती हैं.
- ऐसी नौकरियों का चुनाव करती हैं जो उनके स्त्रीत्व के खिलाफ हैं.
- उनके कपड़े, रहन-सहन, रंग-ढंग सब उनके साथ होने वाली घटनाओं के लिए जि़म्मेदार हैं.
- वे खुद अपने खिलाफ माहौल तैयार करती हैं। मसलन, कहीं वे छोटे कपड़े पहनती हैं, कहीं वे ड्राइवर के साथ रात में अकेले निकल जाती हैं। कभी वे किसी के साथ हंसकर बातें करके उसे आमंत्रित करती हैं. यानी दोष उनका ही है, उनके साथ होने वाली दुर्घटनाओं के लिए.
यह आज का सच है. स्त्रियों की आ$जादी भी, हर पल होने वाली घटनाएं भी और उन घटनाओं पर आने वाली प्रतिक्रियायें भी. आज देश के हालात वो नहीं हैं, जो दस बरस पहले, बीस बरस या पचास बरस पहले थे. आज हालात बहुत बदल चुके हैं. सामाजिक स्तर से लेकर आर्थिक स्तर तक में परिवर्तन आया है. शिक्षा के स्तर में सुधार आया है. गर्ल एजुकेशन का प्रतिशत काफी बढ़ा है. प्रति व्यक्ति आय में खासी वृद्धि हुई है. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बा$जार की निगाहें हम पर लगी हुई हैं. कानूनों की स्थिति बेहतर हुई है. दहेज, संपत्ति का अधिकार, तलाक, लिव इन रिलेशनशिप जैसे कानूनों ने समाज को खुला न$जरिया दिया है जीने का, सोचने का. फिर भी...
जी हां, फिर भी क्या सचमुच न$जरिया खुला है? कम से कम मुझे तो ऐसा नहीं लगता. अगर ऐसा होता तो महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों के आंकड़े लगातार बढ़ न रहे होते. रेप केसेस की बढ़ी हुई संख्या सारी प्रगतिशीलता की चुगली करने के लिए काफी है. सड़कों पर निकलने वाली हर लड़की के कटु अनुभव प्रगतिशीलता की दुशाला तार-तार करने के लिए काफी हैं. कॉलेज कैम्पस में बढ़ती अभद्रता, अश्लीलता और गुंडागर्दी को रोकने के लिए लड़कियों के कपड़ों पर पाबंदी लगाने जैसे तुगलकी फरमान सारी आधुनिकताओं की असलियत सामने लाने के लिए काफी हैं.
स्त्रियों के साथ घटने वाली इन घटनाओं के बाद के बारे में की जाने वाली चर्चाएं भी काफी दहलाने वाली होती हैं. वे भी किसी अपराध से कम नहीं होती. आमतौर पर हर घटना के बाद कहीं न कहीं से स्त्री को ही कम$जोर सिद्ध करने की कोशिश की जाने लगती है.
अरे, वो तो थी ही ऐसी. उसके साथ यही होना था. भला बताइये, ऐसे कपड़े पहनकर घूमेंगी तो क्या होगा?
देर रात तक घूमेंगी (भले ही ऑफिस के काम से) तो और क्या होगा? ऐसे न जाने कितने अभद्र किस्म के दिल को चीरकर रख देने कमेंट्स हमारे बहुत आसपास से आते हैं. यानी पढ़े-लिखे समाज से. क्या पढऩा-लिखना सिर्फ डिग्रियां हासिल करना होता है?
दिमाग के जाले साफ हो सकें ऐसी कोई किताब कभी लिखी जायेगी क्या?
कब तक कोट, पैंट, टाई पहनकर सोलहवीं शताब्दी की सोच में जीता रहेगा यह समाज. क्या सचमुच कपड़ों में, व्यवहार में अश्लीलता होती है. कब तक अपनी कुंठाओं का ठीकरा स्त्रियों के सिर फोड़ा जाता रहेगा. सारी परंपराएं, नैतिकताएं, संस्कार, धर्म-कर्म, समाज की जिम्मेदारी स्त्रियों के सर पर कब तक लादी जाती रहेंगी?
$जरा पूछिये उनसे कि रेप या ईव टीजिंग का शिकार होने वाली लड़कियों में से कितनी जीन्स वालियां होती हैं और कितनी साड़ी या सूट वालियां। मूर्खतापूर्ण तर्कों के पीछे कब तक असली सवालों को छिपाया जाता रहेगा. आखिर कब तक?
-प्रतिभा कटियार.
( २९ जून को i-next में प्रकाशित )
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Tuesday, June 23, 2009
बद चलन लड़की
अभी जून के हंस मे पुन्नी सिंह की एक लघुकथा पढ रही थी।पढने के बाद सोचा कि क्यों न इसे चोखेरबाली पर पोस्ट किया जाए।लेकिन टाइप करने को लेकर आलस हो आया।किसी और का लिखा टाइप करना बहुत मुश्किल लगता है। खैर , इसे आलस समझिए या चतुराई मुझे इसका दूसरा तरीका तुरंत मिल गया।शुरुआत की पहली लाइन और आखिरी लाइन टाइप कर देने भर से ही कहानी पूरी हो रही थी मुझे ऐसा प्रतीत हुआ।सो बीच के 60-70 शंब्द हटा देने पर वह कहानी है -
लड़की अपनी तरह से जीना चाहती थी .और लोगों ने उसका नाम रख दिया- बदचलन लड़की !
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