सास बहू, माँ बेटे, भाई बहन, ननद भाभी ये वह शाश्वत रश्ते हैं जो सृष्टि के आरम्भ से अंत तक चलते रहेंगे. इनके बीच में टकराव , वैमनस्व, अलगाव भी हमेशा से रहे हैं और रहेंगे लेकिन एक अजीब प्रश्न सामने आया जिसका उत्तर हमें खोजना होगा. उस व्यक्ति ने इस का क्या उत्तर खोजा और अपनाया ये मैं बाद में बताउंगी.
एक अनपढ़ और तेजतर्रार माँ जिसने अपने चार बेटों का परिवार अपनी मर्जी से चलाया. पति शहर में नौकरी करते थे सो उनका दखल अधिक न था किन्तु वे बहुत समझदार थे. माँ ने अपने बड़े दो बेटों की शादी अपनी मर्जी से कम उम्र में कर ली और कम पढ़ी लिखी बहुओं पर उनकी सत्ता बरकरार रही. तीसरे नंबर का बेटा पढने में तेज था सो पिता ने शहर में मकान बनवा दिया और उसने CA बनने की सोची. माँ शादी के लिए दबाव डालने लगी उसने mana कर दिया कि छोटे की करना चाहो तो कर लो . मैं इसको पूरा किये बिना शादी नहीं करूंगा. फिर चौथे की भी शादी कर ली.
उसका CA बनने का सपना पूरा हुआ. अब इस बेटे के लिए बहू की खोज शुरू की तो कहा गया कि बहू शहर ki और पढ़ी लिखी होनी चाहिए. बहुत खोजा तब बहू पसंद आई. शादी करके उसको शहर में ही रहना था तो काबू में करने के लिए सास भी शहर में आकर रहने लगी. और बहुओं की तरह उसके साथ भी व्यवहार करने लगीं तो टकराव होने लगा और उन्होंने बहू को मायके भेज दिया. वह उस समय गर्भवती थी. फिर ६ माह बाद बेटी हुई . बेटा नहीं जा सकता था और कोई भी नहीं गया. दूसरी शादी की बात शुरू कर दी. बहू अच्छी नहीं है और फिर बेटा होता तो बुला लेते बेटी हुई है अपने घर में रहे. हमें कोई मतलब नहीं.
बेटे ने मना कर दिया कि ये कोई गुड्डे गुडियों का खेल नहीं है कि जब चाहा छोड़ दिया. मैं शादी नहीं करूंगा.पिता को छोड़ कर सारा घर एक तरफ सिर्फ पिता उसके साथ थे. फिर एक दिन पिता इस घर के तनाव को झेलते झेलते अचानक चल बसे. घर के मालिक बने माँ और बड़ा बेटा.
एक दिन माँ ने उसके सामने सवाल रखा - 'मुझे आज फैसला चाहिए कि माँ अधिक सगी है या पत्नी? तुम्हें एक को चुनना होगा?
यही सवाल का जबाव आप सबसे चाह रही हूँ. हमारे प्रबुद्ध साथी बताएं.
Wednesday, July 14, 2010
Monday, July 12, 2010
किसी भी वक्त घर से निकलना मेरा मानवाधिकार है
जानी-मानी फोटोजर्नलिस्ट सर्वेश ने अपने एक टीवी इंटरव्यू में जोरदार टिप्पणी की।
टीवी ऐंकर का आम-सा सवाल था कि एक महिला होने के नाते इस प्रोफेशन में कोई अड़चन नहीं आती जब उन्हें रात-बिरात अनजानी-अजीब सी जगहों पर भी कवरेज के लिए जाना पड़ता है?
इस पर सर्वेश ने कहा कि रात में भी अकेले काम पर निकलना पड़े तो डर उन्हें बिल्कुल नहीं लगता। सर्वेश के आगे के तर्क लाजवाब कर देने वाले थे- "यह डर वास्तव में समाज-परिवार जबर्दस्ती स्त्री के मन में भरता है। किसी भी वक्त घर जाना या घर से निकलना, कहीं भी जाना हर व्यक्ति का मानवाधिकार है। विना तकनीकी वजह के किसी के लिए ये पाबंदियां मजबूरी में या जबर्दस्ती सोची या लागू की जाती हैं तो यह उसके मानवाधिकार पर चोट है।"
“बलात्कारी के डर से घर से मत निकलो, ऐसा कहने की बजाए बलात्कारी को क्यों नहीं रोका जाता कि तुम बलात्कार न करो?!”
नेट से चुराई हुई सर्वेश की खींची एक तसवीर।

बाकी उनके ब्लॉग सर्वेश फोटोवाली पर पहुंचकर जाना जा सकता है कि उनका कैमरा कहां तक पहुंचा है।
टीवी ऐंकर का आम-सा सवाल था कि एक महिला होने के नाते इस प्रोफेशन में कोई अड़चन नहीं आती जब उन्हें रात-बिरात अनजानी-अजीब सी जगहों पर भी कवरेज के लिए जाना पड़ता है?
इस पर सर्वेश ने कहा कि रात में भी अकेले काम पर निकलना पड़े तो डर उन्हें बिल्कुल नहीं लगता। सर्वेश के आगे के तर्क लाजवाब कर देने वाले थे- "यह डर वास्तव में समाज-परिवार जबर्दस्ती स्त्री के मन में भरता है। किसी भी वक्त घर जाना या घर से निकलना, कहीं भी जाना हर व्यक्ति का मानवाधिकार है। विना तकनीकी वजह के किसी के लिए ये पाबंदियां मजबूरी में या जबर्दस्ती सोची या लागू की जाती हैं तो यह उसके मानवाधिकार पर चोट है।"
“बलात्कारी के डर से घर से मत निकलो, ऐसा कहने की बजाए बलात्कारी को क्यों नहीं रोका जाता कि तुम बलात्कार न करो?!”
नेट से चुराई हुई सर्वेश की खींची एक तसवीर।

बाकी उनके ब्लॉग सर्वेश फोटोवाली पर पहुंचकर जाना जा सकता है कि उनका कैमरा कहां तक पहुंचा है।
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Tuesday, July 6, 2010
धोनी की शादी के मायने
बिलकुल नयी सूचना है, धोनी ने रविवार को अपनी बचपन कि दोस्त साक्षी रावत से विवाह कर लिया। इसके पहले उनके ढेर सारे प्रेम प्रसंग चर्चा में रहे । मुख्य रूप से 'दीपिका पादुकोण' और हाल फिलहाल 'आसिन' से। हमेशा ही ऐसा लगता रहा कि धोनी किसी चर्चित चेहरे से ही विवाह करेंगे लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत। धोनी ने चुनी एक बिलकुल नामालूम सी लड़की। शायद - एक 'हाउस वाइफ'। क्यों? क्या यह फिर से एक बार पुरुषों की "हीन भावना" का मामला है?
प्रेम करने - या फिर कहें मस्ती मारने- तक ऐसी लड़की चलती है जो चर्चित हों। इससे उनकी अहंकार भावना तुष्ट होती रही कि देखो इतनी खूबसूरत और इतनी मशहूर, हज़ारो लाखों की स्वप्न सुंदरी मुझपर मर रही है। लेकिन जब विवाह करने का समय आया तो उन्हें एक घरेलू सी लड़की ही जंची। जिसे कोई नहीं जानता था। निश्चित रूप से किसी फिल्म अभिनेत्री कि अपेक्षा एक 'अनाघ्रात पुष्प' एक 'असूर्यपश्या'। स्पष्ट है कि आजकल किसी फिल्म अभिनेत्री के शरीर का अधिकांश हिस्सा नुमाया ही रहता है- तो मित्रों कि दबी हँसी का खतरा रहता - और मशहूर रहने के कारण भविष्य में थोड़ी बहुत बहुत टकराव की भी आशंका रहती। जाहिर है धोनी ने संभवतः दोनों ही आशकाओं से मुक्ति पा ली है॥
प्रेम करने - या फिर कहें मस्ती मारने- तक ऐसी लड़की चलती है जो चर्चित हों। इससे उनकी अहंकार भावना तुष्ट होती रही कि देखो इतनी खूबसूरत और इतनी मशहूर, हज़ारो लाखों की स्वप्न सुंदरी मुझपर मर रही है। लेकिन जब विवाह करने का समय आया तो उन्हें एक घरेलू सी लड़की ही जंची। जिसे कोई नहीं जानता था। निश्चित रूप से किसी फिल्म अभिनेत्री कि अपेक्षा एक 'अनाघ्रात पुष्प' एक 'असूर्यपश्या'। स्पष्ट है कि आजकल किसी फिल्म अभिनेत्री के शरीर का अधिकांश हिस्सा नुमाया ही रहता है- तो मित्रों कि दबी हँसी का खतरा रहता - और मशहूर रहने के कारण भविष्य में थोड़ी बहुत बहुत टकराव की भी आशंका रहती। जाहिर है धोनी ने संभवतः दोनों ही आशकाओं से मुक्ति पा ली है॥
Friday, June 11, 2010
तलाक की राह आसान
सुना है तलाक अब आसान हो जायेंगे. तलाक आज के दौर की जरूरत बन चुके हैं, सो अदालत को लगता है कि उसकी राह की अड़चनों को भी कम किया जाना चाहिए. अदालत को यह भी लगता है कि इससे जिंदगी कुछ आसान हो जायेगी. ऐसा हो भी सकता है. आखिर हर पल बूंद-बूंद रिसते हुए रिश्तों से निजात पाने में बुराई ही क्या है.
सुनने में कुछ अजीब लग सकता है, (नहीं भी लग सकता है) कि पिछले बरस मैंने जिंदगी में पहली बार एक डिवोर्स पार्टी में शिरकत की थी. तलाक आपसी रजामंदी से हुआ था, सो वर-वधू ने अपने कुछ निकट दोस्तों को बुलाकर खुशी-खुशी एक-दूसरे से अलग होने की इत्तला दी थी. मौका थोड़ा अजीब था लेकिन उस छोटी सी पार्टी का माहौल बहुत ही सुलझा हुआ. दोनों को देखकर बिलकुल भी बेचारगी का अनुभव नहीं हो रहा था. उन दोनों का कहना यही था कि हमें जल्दी ही समझ में आ गया कि हम एक-दूसरे के लिए नहीं बने हैं और हमने एक-दूसरे को समझने में भूल की है. रोज-रोज एक-दूसरे से उलझने और फ्रस्टेशन निकालने से बेहतर है राजी-खुशी अलग हुआ जाए और जिंदगी को बेहतर ढंग से जिया जाए.
उनका तलाक शादी के दो साल बाद फाइल हुआ था और उन्हें तलाक मिलने में 3 साल लगे. वकीलों के मुताबिक उन्हें तलाक जल्दी मिल गया. ऐसे मामलों के बारे में सोचती हूं तो लगता है कि अच्छा ही है कि तलाक की प्रक्रिया आसान हुई. बंधनों से आजाद होना जितना आसान होगा, उतना ही ठीक होगा. लेकिन सवाल यह है कि क्या इस सहूलियत का इकतरफा इस्तेमाल नहीं किया जायेगा. दूसरे विवाह के इच्छुक पति अब आसानी से पहली पत्नी से मुक्ति पा सकेंगे. हमारे यहां कानूनों का ठीक-ठीक फायदा उठाने के मामले में स्त्रियां कितना पीछे हैं, यह किसी से छुपा नहीं है. हर वो कानून जो स्त्रियों के हित के न$जरिये से आता है न जाने कब और कैसे उनके ही खिलाफ खड़ा होने लगता है. कानूनों के मिसयूज की दुहाई देकर समाज उन कानूनों के खिलाफ खड़ा होने लगता है. उदाहरण के लिए डाउरी एक्ट 498 ए को देखा जा सकता है.
सवाल यह है कि क्या हम कानूनों का सही-सही उपयोग करने के लिए भी तैयार नहीं हैं या इन कानूनों में ही कुछ अधूरापन है. लिवइन रिलेशन वाले मामले में अभी कानूनी पेच चल ही रहे हैं कि कितनी वैधानिकता मिलेगी, कब कोई रिश्ता प्रेम की दहलीज लांघकर शोषण की दहलीज में शामिल हो जायेगा. क्या होगा लिवइन रिलेशन से जन्मे बच्चों का, वगैरह. डोमेस्टिक वायलेंस कानून का कितना यूज हो पा रहा है हम जानते ही हैं. हाल ही में आये एक सर्वे में साफ हुआ कि किस तरह महिलाएं पति की मार को उनका हक और प्रेम मानती हैं. ऐसी हालत में कितना कारगर है डोमेस्टिक वायलेंस लॉ. फैमिली कोर्ट की हमारी एक साथी ने बताया कि महिलाएं डरती हैं कि अगर पति, सास या ससुर के खिलाफ डोमेस्टिक वायलेंस का सहारा लिया तो बाद में उनका क्या होगा. कानून हर वक्त तो उनके साथ खड़ा न होगा, जबकि उसे रहना उन्हीं लोगों के बीच है.
बहुत सारे कानूनों से जुड़े बहुत सारे सवाल हैं. लेकिन इन सब सवालों से बड़ा है ये सवाल कि रिश्तों में कानूनों के दखल की जरूरत किस कारण से आई. और अगर आ भी गई है तो उसका इंटरफियरेंस कितना हो, इसे कौन तय करेगा. कानून रिश्तों को सहूलियत देने के लिए बनते हैं लेकिन उस सहूलियत को कितना लिया जा रहा है. इसके पहले कि कानून स्त्रियों के हमसफर बनें, उनके मिसयूज के मामले सामने आने लगते हैं. स्त्रियों के हाथ खाली के खाली. दूसरे, मिसयूज वाले मामलों को इतना हाईलाइट किया जाता है कि लगता है कि सारे कानूनों ने स्त्रियों को आजादी देकर समाज का सर्वनाश कर दिया है. अब भी स्त्रियों को, हर तबके की स्त्रियों को अपने लिए बने कानूनों के बारे में जानने की जरूरत है, उनके महत्व को समझने की जरूरत है और उनका वक्त आने पर सही इस्तेमाल करने की जरूरत भी है.
तलाक बुरी बात नहीं है. लेकिन तलाक कोई खेल भी नहीं है. अदालत का यह फैसला आया तो इसीलिए है कि रिश्तों के नासूर को झेल रहे लोगों को राहत की सांस मिले, देखते हैं क्या होता है.
सुनने में कुछ अजीब लग सकता है, (नहीं भी लग सकता है) कि पिछले बरस मैंने जिंदगी में पहली बार एक डिवोर्स पार्टी में शिरकत की थी. तलाक आपसी रजामंदी से हुआ था, सो वर-वधू ने अपने कुछ निकट दोस्तों को बुलाकर खुशी-खुशी एक-दूसरे से अलग होने की इत्तला दी थी. मौका थोड़ा अजीब था लेकिन उस छोटी सी पार्टी का माहौल बहुत ही सुलझा हुआ. दोनों को देखकर बिलकुल भी बेचारगी का अनुभव नहीं हो रहा था. उन दोनों का कहना यही था कि हमें जल्दी ही समझ में आ गया कि हम एक-दूसरे के लिए नहीं बने हैं और हमने एक-दूसरे को समझने में भूल की है. रोज-रोज एक-दूसरे से उलझने और फ्रस्टेशन निकालने से बेहतर है राजी-खुशी अलग हुआ जाए और जिंदगी को बेहतर ढंग से जिया जाए.
उनका तलाक शादी के दो साल बाद फाइल हुआ था और उन्हें तलाक मिलने में 3 साल लगे. वकीलों के मुताबिक उन्हें तलाक जल्दी मिल गया. ऐसे मामलों के बारे में सोचती हूं तो लगता है कि अच्छा ही है कि तलाक की प्रक्रिया आसान हुई. बंधनों से आजाद होना जितना आसान होगा, उतना ही ठीक होगा. लेकिन सवाल यह है कि क्या इस सहूलियत का इकतरफा इस्तेमाल नहीं किया जायेगा. दूसरे विवाह के इच्छुक पति अब आसानी से पहली पत्नी से मुक्ति पा सकेंगे. हमारे यहां कानूनों का ठीक-ठीक फायदा उठाने के मामले में स्त्रियां कितना पीछे हैं, यह किसी से छुपा नहीं है. हर वो कानून जो स्त्रियों के हित के न$जरिये से आता है न जाने कब और कैसे उनके ही खिलाफ खड़ा होने लगता है. कानूनों के मिसयूज की दुहाई देकर समाज उन कानूनों के खिलाफ खड़ा होने लगता है. उदाहरण के लिए डाउरी एक्ट 498 ए को देखा जा सकता है.
सवाल यह है कि क्या हम कानूनों का सही-सही उपयोग करने के लिए भी तैयार नहीं हैं या इन कानूनों में ही कुछ अधूरापन है. लिवइन रिलेशन वाले मामले में अभी कानूनी पेच चल ही रहे हैं कि कितनी वैधानिकता मिलेगी, कब कोई रिश्ता प्रेम की दहलीज लांघकर शोषण की दहलीज में शामिल हो जायेगा. क्या होगा लिवइन रिलेशन से जन्मे बच्चों का, वगैरह. डोमेस्टिक वायलेंस कानून का कितना यूज हो पा रहा है हम जानते ही हैं. हाल ही में आये एक सर्वे में साफ हुआ कि किस तरह महिलाएं पति की मार को उनका हक और प्रेम मानती हैं. ऐसी हालत में कितना कारगर है डोमेस्टिक वायलेंस लॉ. फैमिली कोर्ट की हमारी एक साथी ने बताया कि महिलाएं डरती हैं कि अगर पति, सास या ससुर के खिलाफ डोमेस्टिक वायलेंस का सहारा लिया तो बाद में उनका क्या होगा. कानून हर वक्त तो उनके साथ खड़ा न होगा, जबकि उसे रहना उन्हीं लोगों के बीच है.
बहुत सारे कानूनों से जुड़े बहुत सारे सवाल हैं. लेकिन इन सब सवालों से बड़ा है ये सवाल कि रिश्तों में कानूनों के दखल की जरूरत किस कारण से आई. और अगर आ भी गई है तो उसका इंटरफियरेंस कितना हो, इसे कौन तय करेगा. कानून रिश्तों को सहूलियत देने के लिए बनते हैं लेकिन उस सहूलियत को कितना लिया जा रहा है. इसके पहले कि कानून स्त्रियों के हमसफर बनें, उनके मिसयूज के मामले सामने आने लगते हैं. स्त्रियों के हाथ खाली के खाली. दूसरे, मिसयूज वाले मामलों को इतना हाईलाइट किया जाता है कि लगता है कि सारे कानूनों ने स्त्रियों को आजादी देकर समाज का सर्वनाश कर दिया है. अब भी स्त्रियों को, हर तबके की स्त्रियों को अपने लिए बने कानूनों के बारे में जानने की जरूरत है, उनके महत्व को समझने की जरूरत है और उनका वक्त आने पर सही इस्तेमाल करने की जरूरत भी है.
तलाक बुरी बात नहीं है. लेकिन तलाक कोई खेल भी नहीं है. अदालत का यह फैसला आया तो इसीलिए है कि रिश्तों के नासूर को झेल रहे लोगों को राहत की सांस मिले, देखते हैं क्या होता है.
Wednesday, May 26, 2010
विरोध के "हथियार' - ब्लॉग,फेसबुक ,इंटरनेट .......
मनीषा
शिकागो की जैन मैकराइट ने ईरानी धर्म गुरु का विरोध शुरू करके फेसबुक पर अपनी तरह का आंदोलन ही चला दिया है। इस धर्माधिकारी ने कहा था कि औरतों के उघड़े बदन को देखकर ईश्वर नाराज हो जाता है और इससे जलजले आते हैं। इसका विरोध छुटपुट रूप में कई जगह दिखा। विद्रोही किस्म की औरतों ने इसके विरोध में ब्लॉग भी लिखे पर जैन की मानसिक रूप से झकझोरने वाली राय को हफ्ते भर में दो लाख सपोर्टर मिले। यह देखकर सीएनएन, बीबीसी, फॉक्स सब हैरान हैं। "बूब क्वेक' के नाम से चलाये जा रहे इस विरोध पर दुनिया भर में गर्मागर्म कमेंट्स औरतों के उग्र तेवर से परंपरावादियों की बोलती बन्द करवाते जा रहे हैं। रियल बूब क्वेक (8 पोस्ट), गो टॉपलेस (24), द बूबक्वेक (71), डिबंकिंग इरानियन क्लरिक नॉनसेंस (71), द टØथ अबाउट ईरान (36), च्वाइस ऑफ सेंसरशिप (56), इस्लाम विल लूज(246), व्हाट एग्जेक्टली बूब क्वेक (50 पोस्ट) बताने के लिए काफी हैं कि पुरातन पंथ पर झाड़ू फेरने वाली फौज को रोकना आसान नहीं है। सामाजिक क्रांति का इससे बहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता। दुनिया भर की औरतें "बहनापे' को लेकर केवल संवेदनशील ही नहीं हो रही हैं, वे यह भी दिखा दे रही हैं कि औरतों के नाम पर होने वाले सम्मेलनों की बजाय मानसिक रूप से एक होने का असर ज्यादा होता है। "बूब क्वेक' को पसंद बताने वालों की संख्या एक लाख से ऊपर नजर आना कोई हंसी-खेल नहीं है। यह शुद्ध रूप से दकियानूस विचारधारा का विरोध है, जिसे कोई राजनैतिक रंग नहीं दिया जा सकता।
सीधे कहूं तो सेक्स अपील और नग्नता देखने वाले की नजरों से ज्यादा मानसिकता में होती है। खुले समाज में तो विरोध प्रदर्शन करने वाली औरतें टॉपलेस होकर अपनी बात कहने का अद्भुत तरीका अपनाती हैं। जिसमें "टॉप फ्रीडम' टाइप के सोशल मूवमेंट भी शामिल हैं। बीच, स्विमिंग पूल, पार्कों जैसी सार्वजनिक जगहों पर ये बराबरी का अधिकार मांगने के लिए ऊपर के कपड़े खोलकर विरोध जताती हैं। सितंबर 2007 में स्वीडन में "बारा ब्रास्ट' (बेयर ब्रोस्ट) के नाम पर आंदोलन किया था। इनको उन जगहों पर खुली छाती के साथ घूमने की इजाजत चाहिए थी, जहां मर्द ऐसे ही घूम सकते हैं। मध्य पूर्व में अकेले इज्राइल ही ऐसी जगह है, जहां औरतें चाहें तो उघड़ी छाती के साथ घूम सकती हैं। हालांकि तेल अवीव जैसे कुछ बीचों पर भी औरतें उन्मुक्त भ्रमण करना पसन्द करती हैं। कुछ विदुषियां इसको "टॉप फ्री' कहने पर अड़ी हुई हैं। जिस वक्त इस्लाम की सलामती मानने वाले धर्म गुरू औरतों के खुले कपड़ों को कोस रहे थे, ठीक उसी समय फ्रांस के राष्ट्रपति ने बुर्के पर रोक लगाकर क्रांतिकारी कदम उठा दिया। औरतों को परदों में लपेटे रहने वाली मानसिकता पर चोट करने का मुफीद समय है, जिस पर दुनिया की तमाम औरतें एकजुट हो चुकी हैं। (देखें ब्लॉग चर्चित स्टार सुचित्रा कृष्णमूर्ति का) यह सच है कि परदे को एकदम से खोलकर बाहर आने का साहस करना केवल सामाजिक ही नहीं मानसिक आंदोलन भी है। खुद को बेपरदा करने को तैयार होना भी मामूली काम नहीं है।
खासकर उन औरतों के लिए जिनकी कई पीढ़ियां पूरा मुंह ढक कर ही बाहर निकली हैं। क्रांति की घुट्टी जबरन नहीं पिलाई जा सकती, लेकिन यह सच है कि अब और कुचला नहीं जा सकता। औरतों को खुलेपन में मजा आ रहा है। वे दिमागी रूप से बराबरी करने को आमादा हैं। भीतर से उठने वाली अपनी आवाज को वे दबाने को तैयार नहीं हैं। उनके साहस को दबाने का प्रयास करने वाले परिवार अब जान भी नहीं सकते कि उनकी बिटिया का ब्लॉग क्या कह रहा है, या किस सोशल साइट पर उसका कितना समर्थन है। सड़कों पर आंदोलन या बहस-मुबाहिसों के नाम पर बाहर निकलने की पाबंदी से भले ही दकियानूस उसे रोक ले रहा था पर मानसिक गुलामी से तो उसने खुद को मुक्त ही कर लिया है।
साभार - राष्ट्रीय सहारा , आधी दुनिया ,26 मई 2010
सुचित्रा कृष्णमूर्ति की उल्लिखित पोस्ट 'बूब्स एण्ड बम्स 'का हिन्दी अनुवाद यहाँ पढें ।
शिकागो की जैन मैकराइट ने ईरानी धर्म गुरु का विरोध शुरू करके फेसबुक पर अपनी तरह का आंदोलन ही चला दिया है। इस धर्माधिकारी ने कहा था कि औरतों के उघड़े बदन को देखकर ईश्वर नाराज हो जाता है और इससे जलजले आते हैं। इसका विरोध छुटपुट रूप में कई जगह दिखा। विद्रोही किस्म की औरतों ने इसके विरोध में ब्लॉग भी लिखे पर जैन की मानसिक रूप से झकझोरने वाली राय को हफ्ते भर में दो लाख सपोर्टर मिले। यह देखकर सीएनएन, बीबीसी, फॉक्स सब हैरान हैं। "बूब क्वेक' के नाम से चलाये जा रहे इस विरोध पर दुनिया भर में गर्मागर्म कमेंट्स औरतों के उग्र तेवर से परंपरावादियों की बोलती बन्द करवाते जा रहे हैं। रियल बूब क्वेक (8 पोस्ट), गो टॉपलेस (24), द बूबक्वेक (71), डिबंकिंग इरानियन क्लरिक नॉनसेंस (71), द टØथ अबाउट ईरान (36), च्वाइस ऑफ सेंसरशिप (56), इस्लाम विल लूज(246), व्हाट एग्जेक्टली बूब क्वेक (50 पोस्ट) बताने के लिए काफी हैं कि पुरातन पंथ पर झाड़ू फेरने वाली फौज को रोकना आसान नहीं है। सामाजिक क्रांति का इससे बहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता। दुनिया भर की औरतें "बहनापे' को लेकर केवल संवेदनशील ही नहीं हो रही हैं, वे यह भी दिखा दे रही हैं कि औरतों के नाम पर होने वाले सम्मेलनों की बजाय मानसिक रूप से एक होने का असर ज्यादा होता है। "बूब क्वेक' को पसंद बताने वालों की संख्या एक लाख से ऊपर नजर आना कोई हंसी-खेल नहीं है। यह शुद्ध रूप से दकियानूस विचारधारा का विरोध है, जिसे कोई राजनैतिक रंग नहीं दिया जा सकता।
वह समय आ चुका है, जो खुलकर कह रहा है कि औरतों के कटावों और उभारों पर वारी जाने वाली दुनिया में पर्दे के लिए कोई जगह नहीं है। उत्तरी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका की तमाम पारंपरिक संस्कृतियों में आज भी टॉपलेस को बुरा नहीं माना जाता। दुनिया भर की तमाम संस्कृतियों में पूजी जाने वाली देवियों को टॉपलेस ही माना गया है, उनको देखकर किसी ईश्वर प्रेमी के दिमाग की नसें नहीं फटीं। ना ही ऐसा कोई जलजला आया, जिसने दुनिया तबाह कर डाली हो। उन्नीसवीं सदी में यूरोप में संभ्रांत घरों की औरतें अपने सौंदर्य का प्रदर्शन करने के लिए घुटनों से नीचे और सीने को खुला ही रखती थी, क्योंकि तब यह स्टेटस सिंबल हुआ करता था। स्विम सूट और बिकनी पहनने वाली लड़कियों को तो जाने ही दीजिए पर अपने यहां पारंपरिक लिबासों, मसलन साड़ी, कुर्ता-सलवार और कमीज पहनने वाली अधेड़ और बूढ़ी औरतों को खुली छाती में देखा जाता है। जिसे झीनी ओढ़नी या पल्लू से ढांपा गया होता है। थुलथुल टाइप की कोई भी बूढ़ी अपने विशाल वक्ष को छिपाने के प्रयास करती नजर नहीं आती, इनके बड़े और ढीले गलों से लगभग आधे वक्ष बाहर ही दिखते हैं, जिनको देखकर घृणित मानसिकता वाला ही कोई घिनौनी बात सोच सकता है।
सीधे कहूं तो सेक्स अपील और नग्नता देखने वाले की नजरों से ज्यादा मानसिकता में होती है। खुले समाज में तो विरोध प्रदर्शन करने वाली औरतें टॉपलेस होकर अपनी बात कहने का अद्भुत तरीका अपनाती हैं। जिसमें "टॉप फ्रीडम' टाइप के सोशल मूवमेंट भी शामिल हैं। बीच, स्विमिंग पूल, पार्कों जैसी सार्वजनिक जगहों पर ये बराबरी का अधिकार मांगने के लिए ऊपर के कपड़े खोलकर विरोध जताती हैं। सितंबर 2007 में स्वीडन में "बारा ब्रास्ट' (बेयर ब्रोस्ट) के नाम पर आंदोलन किया था। इनको उन जगहों पर खुली छाती के साथ घूमने की इजाजत चाहिए थी, जहां मर्द ऐसे ही घूम सकते हैं। मध्य पूर्व में अकेले इज्राइल ही ऐसी जगह है, जहां औरतें चाहें तो उघड़ी छाती के साथ घूम सकती हैं। हालांकि तेल अवीव जैसे कुछ बीचों पर भी औरतें उन्मुक्त भ्रमण करना पसन्द करती हैं। कुछ विदुषियां इसको "टॉप फ्री' कहने पर अड़ी हुई हैं। जिस वक्त इस्लाम की सलामती मानने वाले धर्म गुरू औरतों के खुले कपड़ों को कोस रहे थे, ठीक उसी समय फ्रांस के राष्ट्रपति ने बुर्के पर रोक लगाकर क्रांतिकारी कदम उठा दिया। औरतों को परदों में लपेटे रहने वाली मानसिकता पर चोट करने का मुफीद समय है, जिस पर दुनिया की तमाम औरतें एकजुट हो चुकी हैं। (देखें ब्लॉग चर्चित स्टार सुचित्रा कृष्णमूर्ति का) यह सच है कि परदे को एकदम से खोलकर बाहर आने का साहस करना केवल सामाजिक ही नहीं मानसिक आंदोलन भी है। खुद को बेपरदा करने को तैयार होना भी मामूली काम नहीं है।
खासकर उन औरतों के लिए जिनकी कई पीढ़ियां पूरा मुंह ढक कर ही बाहर निकली हैं। क्रांति की घुट्टी जबरन नहीं पिलाई जा सकती, लेकिन यह सच है कि अब और कुचला नहीं जा सकता। औरतों को खुलेपन में मजा आ रहा है। वे दिमागी रूप से बराबरी करने को आमादा हैं। भीतर से उठने वाली अपनी आवाज को वे दबाने को तैयार नहीं हैं। उनके साहस को दबाने का प्रयास करने वाले परिवार अब जान भी नहीं सकते कि उनकी बिटिया का ब्लॉग क्या कह रहा है, या किस सोशल साइट पर उसका कितना समर्थन है। सड़कों पर आंदोलन या बहस-मुबाहिसों के नाम पर बाहर निकलने की पाबंदी से भले ही दकियानूस उसे रोक ले रहा था पर मानसिक गुलामी से तो उसने खुद को मुक्त ही कर लिया है।
साभार - राष्ट्रीय सहारा , आधी दुनिया ,26 मई 2010
सुचित्रा कृष्णमूर्ति की उल्लिखित पोस्ट 'बूब्स एण्ड बम्स 'का हिन्दी अनुवाद यहाँ पढें ।
Monday, May 17, 2010
एक काल्पनिक पत्र निरुपमा का, मां के नाम
युवा पत्रकार अनुपमा की पत्र शैली में यह प्रतिक्रिया निरुपमा हत्याकांड से जुड़े पहलुओं को समझने की कोशिश करती है। मोहल्ला लाइव पर प्रकाशित यह मां के नाम बेटी निरुपमा का काल्पनिक पत्र मन को छूने के साथ ही, वो सारे सवाल भी उठाता है, जो निरुपमा की स्थिति में पड़ने वाला या उसकी हालत को समझने वाला कोई भी समझदार व्यक्ति सहज ही करता।- अनुराधा
मेरी प्यारी मां,
तुझे बहुत-बहुत-बहुत सारा प्यार!
मां, परसों मदर्स डे था न। मुझे यहां स्वर्गलोक में जरा भी अच्छाप नहीं लग रहा था मां। सोचा क्योंो न पापा की चिट्ठी का जवाब लिखूं, जो दुनिया से विदा होने के पहले उन्होंने मुझे लिखी थी। लेकिन तू तो जानती है न मां कि मैं पापा से ज्या,दा बातें नहीं कह पाती। जो कहना होता है, तुमसे ही कहती हूं। तो मदर्स डे के दिन अपने अजन्मे बच्चेी के साथ दिन भर यूं ही तुझे याद करती रही और कुछ-कुछ लिखने की कोशिश करती रही।
मां, मुझे अच्छा नहीं लग रहा कि तू मेरे कारण परेशान है और फजीहत झेल रही है लेकिन मैं अब कुछ कर भी तो नहीं सकती न! बहुत दूर हूं मां। अगर करने की स्थिति में होती, तो तुम्हें कष्ट न होने देती। ऐसे भी तुझे पता है न कि मैं अपनी मां पर जान छिड़कती हूं, उसे कितना प्यार करती हूं, यह शब्दोंक में बयां नहीं कर सकती। तू ही बता न कि अगर मैं मां-पापा से प्या,र न करती और भरोसे का कत्ल करना चाहती तो क्यों सिर्फ यह पूछने के लिए दिल्ली से कोडरमा जाती कि क्या् मैं प्रिभयांशु से शादी करूं। मां उसके साथ पति-पत्नी के रिश्ते के बीच जितने भी तरह के भाव होते हैं, उन सभी भावों से तो गुजर ही चुकी थी न, सिर्फ एक सामाजिक मान्यता मिलनी बाकी थी।
मां, प्रिभयांशु के साथ मैं एक दोस्त या प्रेमिका की तरह नहीं बल्कि हमसफर की तरह ही रह रही थी। और फिर मुझे आपलोगों के भरोसे का कत्ल करना होता तो मैं अपनी अन्य सहेलियों की तरह कोर्ट में शादी करने के बाद बताती कि मैंने शादी कर ली। तब आपलोगों की मजबूरी होती मां कि अपनी सहमति की मुहर लगाएं। लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। मैं दो वर्षों के प्या र पर जीवन देने वाली मां और पालन करने वाले पिता के प्यार को हल्का नहीं करना चाहती थी। उसका मान कम नहीं करना चाहती थी।
यह भरोसा था मुझे मां कि जब आपलोगों ने झुमरी तिलैया से मुझे पढ़ाई करने के लिए दिल्ली् भेजा है, अखबारी दुनिया में नौकरी करने की छूट दी है तो फिर अपने तरीके से, अपनी पसंद के लड़के के साथ जिंदगी भी गुजारने देंगे। मैं कानूनन सब करने में सक्षम थी मां, लेकिन मैं कानून से ज्यादा आपलोगों की कद्र करती थी। आपलोगों पर भरोसा करती थी। इसलिए सहमति की मुहर लगाने कोडरमा पहुंची थी। और सुनो न मां, अब तो दो-दो जिंदगियां बरबाद हो ही चुकी हैं। मैं और मेरी संतान ने दुनिया से अलग कर लिया है खुद को। अब प्रियभांशु को भी बरबाद करने के लिए दांव-पेंच क्यों चले जा रहे हैं मां।
मां, क्या- मैं बेवकूफ थी, जो मुझे पता नहीं चल सका था कि मेरे गर्भ में उसका बच्चा पल रहा है? मैं अबॉर्शन करा सकती थी न, लेकिन मैंने नहीं करवाया। मैं और कई उपाय भी अपना सकती थी लेकिन नहीं अपनाये। इसलिए कि मैं प्रिभयांशु को मन से चाहती थी, तो तन देने में भी नहीं हिचकी। मां उसने कोई बलात्कार नहीं किया और न ही संबंध बनाने के बाद मुझे बंधक बनाकर रखा कि नहीं तुझे बच्चे को जन्म देना ही होगा। यह सब मेरी सहमति से ही हुआ होगा न मां, तो उसे क्यों फंसाने पर आमादा है पुलिस। जरा इस बात पर भी सोचना तुम।
हां मां, अब यहां स्वर्गलोक में आ चुकी हूं तो यहां कोई भागदौड़ नहीं। फुर्सत ही फुर्सत है। ऐसी फुर्सत कि वक्त काटे नहीं कट रहा। धरती की तरह जीवन की बहुरंगी झलक नहीं है यहां, जीवन एकाकी और एकरस है। लिखने की आदत भी पड़ गयी है, तो सोच रही हूं कि आज पापा के उस आखिरी खत का जवाब भी दे दूं। पापा से कहना वो मेरे जवाब को मेरी हिमाकत न समझें बल्कि एक विनम्र निवेदन समझेंगे।
उन्होंने अपने पत्र में सनातन धर्म का हवाला दिया है। अब यहां स्वर्गलोक में जब फुर्सत है तो सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों से भी परिचित हो रही हूं। सनातन धर्म के बारे में पापा शायद ज्यादा जानते होंगे मां लेकिन मैं अब सोच रही हूं कि मैंने भी तो उसी धर्म के अनुरूप ही काम किया न। मां, सनातन धर्म ने तो प्रेम पर कभी पाबंदी नहीं लगायी और न ही जातीय बंधन इसमें कभी हावी रहा। देखो ना मां, कृष्णन की ही बात कर करो। जगतपालक विष्णुग के अवतार कृष्ण । प्रेम की ऐसी प्रतिमूर्ति बने कि रुक्मिणी को भूल लोग उन्हें राधा के संग ही पूजने लगे। घर-घर में तो पूजते हैं लोग राधा-कृष्ण को। फिर राधा-कृष्ण की तरह रहने की छूट क्यों नहीं देते अपनी बेटियों को? क्याण राधा-कृष्ण सिर्फ पूजे जाने के लिए हैं? जीवन में उतारे जाने के लिए नहीं? और यदि जीवन में जो चीजें नहीं उतारी जा सकतीं, उसे वर्जना के दायरे में रखा जाना चाहिए न मां। मां अपने कोडरमा वाले घर में भी राधा-कृष्ण की तस्वीर है, हटा देना उसे सदा-सदा के लिए।
हां मां, पापा से कहना कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की तस्वीर भी फेंक दें, वह भी सनातन धर्म की कसौटी पर पूजे जाने लायक नहीं हैं। याद हैं मां, बचपन से एक भजन मैं सुना करती थी – बाग में जो गयी थी जनक नंदिनी, चारों अंखियां लड़ी की लड़ी रह गयीं। राम देखे सिया और सिया राम को। चारों अंखियां लड़ी की लड़ी रह गयीं… फिर भाव समझाते थे प्रवचनी बाबा कि शिवधनुष तोड़ने से पहले का नजारा है यह। सीता जी फूल तोड़ने बाग में गयी थीं, राम से नैन लड़े तो दोनों एक दूसरे पर मोहित हो गये। जानती हो मां, इस भजन को याद आने के बाद मैं यह सोच रही हूं कि राम ने भी तो अपने पिता की मर्जी से सीता से शादी की नहीं थी। वह तो गये थे अपने गुरू के साथ ताड़का से रक्षा के लिए लेकिन जब नजरें सीता से मिलीं तो चले गये शिवधनुष तोड़ने। क्या राम को यह नहीं पता था कि धनुष तोड़ने का मतलब होगा शादी कर लेना। फिर क्यों नहीं एक बार उन्होंने अपने पिता दशरथ से यह अनुमति ली। दशरथ को तो बाद में पता चला न मां कि जनक की बेटी से उनका बेटा शादी करने जा रहा है। तो मां, क्या गुरु के जानने से काम चल जाता है। मेरे भी गुरू तो जानते ही थे न। दिल्ली में रहनेवाले सभी गुरु और मित्र इस बात के जानते थे कि मैं प्रिभयांशु से शादी करने जा रही हूं। फिर भी मैंने गुरु के बजाय आपलोगों की सहमति लेना जरूरी समझा। राम की तस्वीमर हटा देना मां उन्होंने भी अपने पिता से पूछे बिना अपना ब्यागह तय कर लिया था।
मां, पिताजी को माता कुंती की भी याद दिलाना न। सनातनी कुंती की। उन्हें तो कोई कभी कुल्टा नहीं कहता। उन्हें आदर्श क्योंस माना जाता है जबकि उन्होंने छह पुत्रों का जन्म पांच अलग-अलग पुरुषों से संबंध बनाकर दिया। और मां कर्ण वह तो विवाह से पहले ही उनके गर्भ से आये थे न। यह तो सनातनी पौराणिक इतिहास ही कहता है न मां। फिर कुंती को कुल्टाप क्यों नहीं कहते पापा। पापा की कसौटी पर तो तो वह चरित्रहीन ही कही जानी चाहिए।
और द्रौपदी, मां। कोई द्रौपदी को दोष क्योंप नहीं देता। अच्छात जरा ये बताओ तो मां कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, कोई एक स्त्री पांच-पांच पुरुषों के साथ कैसे रह सकती है। लेकिन वो रहती थी और उसे कोई दोष नहीं देता। पापा को कहना कि वह द्रौपदी को भी अच्छीद औरतों की श्रेणी में न रखा करें। एक बात कहूं मां, पापा ने शुरुआती दिनों में ही एक गलती कर दी थी। मुझे धर्म प्रवचन की बातें बताकर। उन्होंने ही एक बार बताया था कि इस जगत में ब्रह्मा की पूजा क्यों नहीं होती क्योंकि ब्रह्मा ने अपनी ही मानस पुत्री से शादी कर ली थी। छि: कितने गंदे थे न ब्रह्मा।
और मां, रामचंद्र के वंशजों में तो किसी की तस्वीकर घर में नहीं रखना, क्योंककि तुम्हें भी तो पापा ने बताया ही होगा कि धर्म अध्यात्म और सनातनी इतिहास के क्रम में भागीरथी कैसे दुनिया में आये थे। दो महिलाओं के आपसी संबंध से उत्पन्न हुए थे न मां वो। यानी लेस्बियनिज्म की देन थे। बताओ तो सही, भला नैतिक रूप से कहां आये थे वो? मैं भी गंदी थी मां। अनैतिक। इन लोगों की तरह ही अनैतिक। मैं कुतर्क नहीं कर रही और न ही अपने पक्ष में कोई दलील ही दे रही हूं मां। यह सब मन में बातें आयीं तो सोचा तुमसे कह दूं। खैर, एक बात कहूं मां, मुझसे तू चाहे जिंदगी भर नफरत करना, घृणा करना, लेकिन अब छोड़ दो न प्रिभयांशु को। उसने कुछ नहीं किया जबरदस्ती मेरे साथ। मैं बच्चीफ नहीं थी मां और न ही अनपढ़-गंवार थी। सब मेरी रजामंदी से ही हुआ होगा न मां।
और हां मां, मुझे फिर से धरती पर भेजने की तैयारी चल रही है। मेरे बच्चे को भी फिर से दुनिया में भेजा जाएगा। मैंने तो सोच लिया है कि इस बार अपने नाम के आगे पीछे कोई टाइटल नहीं लगाऊंगी। सीधे-सीधे नाम लिखूंगी। कोई पाठक, तिवारी, यादव, सिंह नहीं। सीधे-सीधे सिर्फ नाम। जैसे कि दशरथ, राम, कृष्ण… इन सबकी तरह। इनके नामों के साथ कहां लिखा हुआ मिलता है कि दशरथ सिंह, राम सिंह, कृष्णी यादव। मां मैं फिर आ रही हूं। इस बार फिर प्याार करुंगी। अपने तरीके से जीने की कोशिश करुंगी। फिर मारी जाऊंगी तो भी परवाह नहीं। पर एक ख्वाफहिश है मां, ईश्वर से मेरे लिए दुआ मांगना कि इस बार किसी अनपढ़ के यहां जन्म लूं… जो ज्यादा ज्ञान रखता हो। जो सनातनी हो लेकिन व्यावहारिक सनातनी, सैद्धांतिक नहीं। जो कम से कम अपने संतान को अपने तरीके से जीने की आजादी दे।
बस मां! अभी इतना ही । शेष फिर कभी। तुम अपना ख्याल रखना मां और पापा का भी। भाई-मामा को प्रणाम कहना। जल्दी ही मिलती हूं मां। नाम बदला हो सकता है लेकिन तू गौर करती रहना… तुम मुझे पहचान ही लोगी।
तुम्हारी बेटी
निरुपमा
(अनुपमा। झारखंड की चर्चित पत्रकार। प्रभात खबर में लंबे समय तक जुड़ाव के बाद स्वतंत्र रूप से रूरल रिपोर्टिंग। महिला और मानवाधिकार के सवालों पर लगातार सजग। देशाटन में दिलचस्पी। प्रभात खबर के लिए ब्लॉगिंग पर नियमित स्तंभ लेखन।)
-साभारः मोहल्ला लाइव
मेरी प्यारी मां,
तुझे बहुत-बहुत-बहुत सारा प्यार!
मां, परसों मदर्स डे था न। मुझे यहां स्वर्गलोक में जरा भी अच्छाप नहीं लग रहा था मां। सोचा क्योंो न पापा की चिट्ठी का जवाब लिखूं, जो दुनिया से विदा होने के पहले उन्होंने मुझे लिखी थी। लेकिन तू तो जानती है न मां कि मैं पापा से ज्या,दा बातें नहीं कह पाती। जो कहना होता है, तुमसे ही कहती हूं। तो मदर्स डे के दिन अपने अजन्मे बच्चेी के साथ दिन भर यूं ही तुझे याद करती रही और कुछ-कुछ लिखने की कोशिश करती रही।
मां, मुझे अच्छा नहीं लग रहा कि तू मेरे कारण परेशान है और फजीहत झेल रही है लेकिन मैं अब कुछ कर भी तो नहीं सकती न! बहुत दूर हूं मां। अगर करने की स्थिति में होती, तो तुम्हें कष्ट न होने देती। ऐसे भी तुझे पता है न कि मैं अपनी मां पर जान छिड़कती हूं, उसे कितना प्यार करती हूं, यह शब्दोंक में बयां नहीं कर सकती। तू ही बता न कि अगर मैं मां-पापा से प्या,र न करती और भरोसे का कत्ल करना चाहती तो क्यों सिर्फ यह पूछने के लिए दिल्ली से कोडरमा जाती कि क्या् मैं प्रिभयांशु से शादी करूं। मां उसके साथ पति-पत्नी के रिश्ते के बीच जितने भी तरह के भाव होते हैं, उन सभी भावों से तो गुजर ही चुकी थी न, सिर्फ एक सामाजिक मान्यता मिलनी बाकी थी।
मां, प्रिभयांशु के साथ मैं एक दोस्त या प्रेमिका की तरह नहीं बल्कि हमसफर की तरह ही रह रही थी। और फिर मुझे आपलोगों के भरोसे का कत्ल करना होता तो मैं अपनी अन्य सहेलियों की तरह कोर्ट में शादी करने के बाद बताती कि मैंने शादी कर ली। तब आपलोगों की मजबूरी होती मां कि अपनी सहमति की मुहर लगाएं। लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। मैं दो वर्षों के प्या र पर जीवन देने वाली मां और पालन करने वाले पिता के प्यार को हल्का नहीं करना चाहती थी। उसका मान कम नहीं करना चाहती थी।
यह भरोसा था मुझे मां कि जब आपलोगों ने झुमरी तिलैया से मुझे पढ़ाई करने के लिए दिल्ली् भेजा है, अखबारी दुनिया में नौकरी करने की छूट दी है तो फिर अपने तरीके से, अपनी पसंद के लड़के के साथ जिंदगी भी गुजारने देंगे। मैं कानूनन सब करने में सक्षम थी मां, लेकिन मैं कानून से ज्यादा आपलोगों की कद्र करती थी। आपलोगों पर भरोसा करती थी। इसलिए सहमति की मुहर लगाने कोडरमा पहुंची थी। और सुनो न मां, अब तो दो-दो जिंदगियां बरबाद हो ही चुकी हैं। मैं और मेरी संतान ने दुनिया से अलग कर लिया है खुद को। अब प्रियभांशु को भी बरबाद करने के लिए दांव-पेंच क्यों चले जा रहे हैं मां।
मां, क्या- मैं बेवकूफ थी, जो मुझे पता नहीं चल सका था कि मेरे गर्भ में उसका बच्चा पल रहा है? मैं अबॉर्शन करा सकती थी न, लेकिन मैंने नहीं करवाया। मैं और कई उपाय भी अपना सकती थी लेकिन नहीं अपनाये। इसलिए कि मैं प्रिभयांशु को मन से चाहती थी, तो तन देने में भी नहीं हिचकी। मां उसने कोई बलात्कार नहीं किया और न ही संबंध बनाने के बाद मुझे बंधक बनाकर रखा कि नहीं तुझे बच्चे को जन्म देना ही होगा। यह सब मेरी सहमति से ही हुआ होगा न मां, तो उसे क्यों फंसाने पर आमादा है पुलिस। जरा इस बात पर भी सोचना तुम।
हां मां, अब यहां स्वर्गलोक में आ चुकी हूं तो यहां कोई भागदौड़ नहीं। फुर्सत ही फुर्सत है। ऐसी फुर्सत कि वक्त काटे नहीं कट रहा। धरती की तरह जीवन की बहुरंगी झलक नहीं है यहां, जीवन एकाकी और एकरस है। लिखने की आदत भी पड़ गयी है, तो सोच रही हूं कि आज पापा के उस आखिरी खत का जवाब भी दे दूं। पापा से कहना वो मेरे जवाब को मेरी हिमाकत न समझें बल्कि एक विनम्र निवेदन समझेंगे।
उन्होंने अपने पत्र में सनातन धर्म का हवाला दिया है। अब यहां स्वर्गलोक में जब फुर्सत है तो सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों से भी परिचित हो रही हूं। सनातन धर्म के बारे में पापा शायद ज्यादा जानते होंगे मां लेकिन मैं अब सोच रही हूं कि मैंने भी तो उसी धर्म के अनुरूप ही काम किया न। मां, सनातन धर्म ने तो प्रेम पर कभी पाबंदी नहीं लगायी और न ही जातीय बंधन इसमें कभी हावी रहा। देखो ना मां, कृष्णन की ही बात कर करो। जगतपालक विष्णुग के अवतार कृष्ण । प्रेम की ऐसी प्रतिमूर्ति बने कि रुक्मिणी को भूल लोग उन्हें राधा के संग ही पूजने लगे। घर-घर में तो पूजते हैं लोग राधा-कृष्ण को। फिर राधा-कृष्ण की तरह रहने की छूट क्यों नहीं देते अपनी बेटियों को? क्याण राधा-कृष्ण सिर्फ पूजे जाने के लिए हैं? जीवन में उतारे जाने के लिए नहीं? और यदि जीवन में जो चीजें नहीं उतारी जा सकतीं, उसे वर्जना के दायरे में रखा जाना चाहिए न मां। मां अपने कोडरमा वाले घर में भी राधा-कृष्ण की तस्वीर है, हटा देना उसे सदा-सदा के लिए।
हां मां, पापा से कहना कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की तस्वीर भी फेंक दें, वह भी सनातन धर्म की कसौटी पर पूजे जाने लायक नहीं हैं। याद हैं मां, बचपन से एक भजन मैं सुना करती थी – बाग में जो गयी थी जनक नंदिनी, चारों अंखियां लड़ी की लड़ी रह गयीं। राम देखे सिया और सिया राम को। चारों अंखियां लड़ी की लड़ी रह गयीं… फिर भाव समझाते थे प्रवचनी बाबा कि शिवधनुष तोड़ने से पहले का नजारा है यह। सीता जी फूल तोड़ने बाग में गयी थीं, राम से नैन लड़े तो दोनों एक दूसरे पर मोहित हो गये। जानती हो मां, इस भजन को याद आने के बाद मैं यह सोच रही हूं कि राम ने भी तो अपने पिता की मर्जी से सीता से शादी की नहीं थी। वह तो गये थे अपने गुरू के साथ ताड़का से रक्षा के लिए लेकिन जब नजरें सीता से मिलीं तो चले गये शिवधनुष तोड़ने। क्या राम को यह नहीं पता था कि धनुष तोड़ने का मतलब होगा शादी कर लेना। फिर क्यों नहीं एक बार उन्होंने अपने पिता दशरथ से यह अनुमति ली। दशरथ को तो बाद में पता चला न मां कि जनक की बेटी से उनका बेटा शादी करने जा रहा है। तो मां, क्या गुरु के जानने से काम चल जाता है। मेरे भी गुरू तो जानते ही थे न। दिल्ली में रहनेवाले सभी गुरु और मित्र इस बात के जानते थे कि मैं प्रिभयांशु से शादी करने जा रही हूं। फिर भी मैंने गुरु के बजाय आपलोगों की सहमति लेना जरूरी समझा। राम की तस्वीमर हटा देना मां उन्होंने भी अपने पिता से पूछे बिना अपना ब्यागह तय कर लिया था।
मां, पिताजी को माता कुंती की भी याद दिलाना न। सनातनी कुंती की। उन्हें तो कोई कभी कुल्टा नहीं कहता। उन्हें आदर्श क्योंस माना जाता है जबकि उन्होंने छह पुत्रों का जन्म पांच अलग-अलग पुरुषों से संबंध बनाकर दिया। और मां कर्ण वह तो विवाह से पहले ही उनके गर्भ से आये थे न। यह तो सनातनी पौराणिक इतिहास ही कहता है न मां। फिर कुंती को कुल्टाप क्यों नहीं कहते पापा। पापा की कसौटी पर तो तो वह चरित्रहीन ही कही जानी चाहिए।
और द्रौपदी, मां। कोई द्रौपदी को दोष क्योंप नहीं देता। अच्छात जरा ये बताओ तो मां कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, कोई एक स्त्री पांच-पांच पुरुषों के साथ कैसे रह सकती है। लेकिन वो रहती थी और उसे कोई दोष नहीं देता। पापा को कहना कि वह द्रौपदी को भी अच्छीद औरतों की श्रेणी में न रखा करें। एक बात कहूं मां, पापा ने शुरुआती दिनों में ही एक गलती कर दी थी। मुझे धर्म प्रवचन की बातें बताकर। उन्होंने ही एक बार बताया था कि इस जगत में ब्रह्मा की पूजा क्यों नहीं होती क्योंकि ब्रह्मा ने अपनी ही मानस पुत्री से शादी कर ली थी। छि: कितने गंदे थे न ब्रह्मा।
और मां, रामचंद्र के वंशजों में तो किसी की तस्वीकर घर में नहीं रखना, क्योंककि तुम्हें भी तो पापा ने बताया ही होगा कि धर्म अध्यात्म और सनातनी इतिहास के क्रम में भागीरथी कैसे दुनिया में आये थे। दो महिलाओं के आपसी संबंध से उत्पन्न हुए थे न मां वो। यानी लेस्बियनिज्म की देन थे। बताओ तो सही, भला नैतिक रूप से कहां आये थे वो? मैं भी गंदी थी मां। अनैतिक। इन लोगों की तरह ही अनैतिक। मैं कुतर्क नहीं कर रही और न ही अपने पक्ष में कोई दलील ही दे रही हूं मां। यह सब मन में बातें आयीं तो सोचा तुमसे कह दूं। खैर, एक बात कहूं मां, मुझसे तू चाहे जिंदगी भर नफरत करना, घृणा करना, लेकिन अब छोड़ दो न प्रिभयांशु को। उसने कुछ नहीं किया जबरदस्ती मेरे साथ। मैं बच्चीफ नहीं थी मां और न ही अनपढ़-गंवार थी। सब मेरी रजामंदी से ही हुआ होगा न मां।
और हां मां, मुझे फिर से धरती पर भेजने की तैयारी चल रही है। मेरे बच्चे को भी फिर से दुनिया में भेजा जाएगा। मैंने तो सोच लिया है कि इस बार अपने नाम के आगे पीछे कोई टाइटल नहीं लगाऊंगी। सीधे-सीधे नाम लिखूंगी। कोई पाठक, तिवारी, यादव, सिंह नहीं। सीधे-सीधे सिर्फ नाम। जैसे कि दशरथ, राम, कृष्ण… इन सबकी तरह। इनके नामों के साथ कहां लिखा हुआ मिलता है कि दशरथ सिंह, राम सिंह, कृष्णी यादव। मां मैं फिर आ रही हूं। इस बार फिर प्याार करुंगी। अपने तरीके से जीने की कोशिश करुंगी। फिर मारी जाऊंगी तो भी परवाह नहीं। पर एक ख्वाफहिश है मां, ईश्वर से मेरे लिए दुआ मांगना कि इस बार किसी अनपढ़ के यहां जन्म लूं… जो ज्यादा ज्ञान रखता हो। जो सनातनी हो लेकिन व्यावहारिक सनातनी, सैद्धांतिक नहीं। जो कम से कम अपने संतान को अपने तरीके से जीने की आजादी दे।
बस मां! अभी इतना ही । शेष फिर कभी। तुम अपना ख्याल रखना मां और पापा का भी। भाई-मामा को प्रणाम कहना। जल्दी ही मिलती हूं मां। नाम बदला हो सकता है लेकिन तू गौर करती रहना… तुम मुझे पहचान ही लोगी।
तुम्हारी बेटी
निरुपमा
(अनुपमा। झारखंड की चर्चित पत्रकार। प्रभात खबर में लंबे समय तक जुड़ाव के बाद स्वतंत्र रूप से रूरल रिपोर्टिंग। महिला और मानवाधिकार के सवालों पर लगातार सजग। देशाटन में दिलचस्पी। प्रभात खबर के लिए ब्लॉगिंग पर नियमित स्तंभ लेखन।)
-साभारः मोहल्ला लाइव
Friday, May 14, 2010
एक जादुई गोली के पचास साल
राजकिशोर
उस गर्भनिरोधक गोली को, जिसे अंग्रेजी की दुनिया में पिल कहते हैं, आधिकारिक मान्यता मिले हुए पचास साल हो गए। यह अवसर खुशी मनाने का है। स्त्री स्वतंत्रता के पक्षधरों को कुछ खास खुशी होनी चाहिए, क्योंकि पिल ने स्त्री समुदाय को एक बहुत बड़ी प्राकृतिक जंजीर से मुक्ति दी है। अगर पिल न होता, तो यौन क्रांति भी न होती। यौन क्रांति न होती, तो स्त्री स्वतंत्रता के आयाम भी बहुत सीमित रह जाते।
बेशक यह जादुई गोली उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितना पेनिसिलिन का आविष्कार, जिसने चिकित्सा के क्षेत्र में एक चमत्कार का काम किया। पिल का महत्व एसपिरिन या पैरासिटामोल जितना भी नहीं है। लेकिन ये दवाएं हैं। पिल कोई दवा नहीं है। वैसे गर्भनिरोधक गोली का आविष्कार भी स्त्रियों में बांझपन का इलाज खोजने की प्रक्रिया में हुआ था। आज भी पिल का प्रयोग कई स्त्री रोगों का इलाज करने के लिए होता है, लेकिन अधिकतर मामलों में यह गर्भनिरोधक की तरह ही प्रयुक्त होता है और गर्भाधान कोई बीमारी नहीं है। लेकिन अनिच्छित गर्भाधान एक बहुत बड़ी समस्या जरूर है, जिसके कुफल स्त्री को ही भुगतने पड़ते हैं। कहा जा सकता है कि उसके लिए तो यह बीमारियों की बीमारी है। पिल ने उन्हें सुरक्षित और स्वतंत्र जीवन जीने का अवसर प्रदान किया है। इस मायने में यह छोटी-सी गोली जितनी जादुई है, उतनी ही क्रांतिकारी भी।
गर्भाधान की जिम्मेदारी सौंप कर प्रकृति ने स्त्रियों के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है। पुरुष के हिस्से सिर्फ आनंद और स्त्री के हिस्से आनंद के साथ-साथ एक बड़ी और लंबी जिम्मेदारी। इसी आधार पर अनेक स्त्रीवादी विचारकों का मत है कि स्त्री का शरीर तंत्र ही उसका सबसे बड़ा शत्रु है। रेडिकल मार्क्सवादी विचारक शुलामिथ फायरस्टोन मानती थीं कि जब तक स्त्री को गर्भाशय से मुक्ति नहीं मिलती, तब तक उसकी वास्तविक मुक्ति संभव नहीं है। गर्भाशय स्त्रियों को कई तरीकों से बाधित और कंडीशन करता है। यह उसके व्यक्तित्व को ही बदल देता है।
अनिच्छित गर्भाधान से छुटकारा पाने का प्रयास शायद उतना ही पुराना है जितना मानव संस्कृति का इतिहास। गर्भाधान न हो और हो जाए तो उससे छुटकारा पाया जा सके, इसके लिए अनेक तरीके खोजे जाते रहे। उनमें से कोई भी तरीका संतोषजनक नहीं था। कुछ तरीके तो ऐसे थे जिनसे स्त्री की जान पर बन आती थी। उस बेचारी को इज्जत और परिवार के सुख-चैन के लिए इस कठोर अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ता था। दुर्भाग्यवश आज भी दुनिया के बहुत बड़े इलाके में यह अग्निपरीक्षा जारी है। इन इलाकों में हमारा अपना देश भी शामिल है। हर साल हजारों या क्या पता लाखों स्त्रियां अनचाहे गर्भ से मुक्ति पाने की प्रक्रिया में भयावह यंत्रणा सहती हैं और उनमें से अनेक तो जान से भी हाथ धो बैठती हैं। स्पष्ट है कि मानव स्वाधीनता के औजार अभी भी कुछ खास देशों और एक खास वर्ग तक सीमित हैं। पिल भी ऐसा ही एक औजार है।
कुछ लोगों का मानना है कि पिल (और कंडोम) ने यौन अराजकता को बढ़ावा दिया है। अगर पिल न होता, तो स्त्रियां और पुरुष मर्यादा में रहते। पिल के कारण गर्भ निरोध की युक्ति इतनी आसान और इतनी कम खर्चीली हो गई है कि किसी को भी लंबे समय के रिश्तों में दिलचस्पी नहीं रही। मनुष्य पशुओं की तरह आचरण करने लगे हैं। व्यभिचारी स्त्री-पुरुषों की बन आई है। उन्हें अपने कर्म के परिणाम की चिंता नहीं रही, क्योंकि पिल है न।
यह आलोचना पूरी तरह निस्सार नहीं है, लेकिन इतना खतरा तो किसी भी नए आविष्कार के साथ जुड़ा हुआ होता है। सवाल यह है कि जब तक पिल बाजार में नहीं आया था, क्या दुनिया में व्यभिचार नहीं था ? या, यौन उच्छृंखलता नहीं थी? अपनी विवाहिता को साल-दर-साल गर्भवती करते जाना पुरुष सत्ता की यौन उच्छृंखलता नहीं थी तो क्या था? पिल का सबसे अहम योगदान यह है कि यह स्त्री को अपने शरीर पर नियंत्रण प्रदान करता है और इस तरह उसे स्वाधीन बनाता है। लेकिन यह कहना गलत है कि सिर्फ पिल ने स्त्री को स्वतंत्रता दी। सच यह है कि स्वतंत्रता का वातावरण और पिल, दोनों लगभग साथ-साथ आए। इसे सामाजिक विकास और वैज्ञानिक विकास का युग्म कहा जा सकता है। दोनों का ही ज्ञान और चेतना के प्रसार से गहरा संबंध है। ज्ञान की पुरानी अवस्था में न तो पिल की खोज की जा सकती थी और न चेतना की पुरानी अवस्था में इसका प्रयोग उतना व्यापक हो सकता था जितना आज है।
सवाल यह भी है कि स्वतंत्रता का दुरुपयोग किसे कहेंगे? स्त्री के संदर्भ में क्या पुरुष अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग हजारों वर्षों से नहीं करता आया है? लेकिन पिल ने अगर इन पचास वर्षों में स्त्री को यह चुनने की आजादी दी है कि जब वह चाहे, तभी गर्भाधान हो और औरत इसका लाभ उठाती है, तो किस तर्क से इसे स्वतंत्रता का दुरुपयोग कहा जा सकता है? वस्तुत: जिस यौन अराजकता की बात की जाती है, वह पिल की नहीं, वर्तमान उपभोक्ता संस्कृति की देन है। हां, पिल ने जिस एक महत्वपूर्ण सत्य से हमारा साक्षात्कार कराया है, वह यह है कि यौन समागम कोई उतनी बड़ी घटना नहीं है जितना इसे बना दिया गया है। यह वैसा ही एक मानव व्यवहार है जैसा खाना, पीना या चलना-फिरना। पिल का शुक्रिया कि उसकी मदद से हम एक बहुत बड़े मिथक से मुक्त हो पाए हैं, जिसने मानव जीवन को नरक बना रखा था।
यह शिकायत जरूर वाजिब है कि सत्ता और अर्थव्यवस्था की संरचना ने पिल तक औरतों की पहुंच को सीमित कर रखा है। यह इस बात का प्रमाण है कि गुलामी की कौन-सी बेड़ियां अभी तक मानव समाज के विकास को निरुद्ध किए हुए हैं। दूसरी ओर, पिल ने केवल स्त्री को ही नहीं, उसके साथी पुरुष को भी मुक्त किया है, जो इस बात का एक और प्रमाण है कि स्त्री मुक्ति और पुरुष मुक्ति दोनों साथ-साथ चलते हैं।
उस गर्भनिरोधक गोली को, जिसे अंग्रेजी की दुनिया में पिल कहते हैं, आधिकारिक मान्यता मिले हुए पचास साल हो गए। यह अवसर खुशी मनाने का है। स्त्री स्वतंत्रता के पक्षधरों को कुछ खास खुशी होनी चाहिए, क्योंकि पिल ने स्त्री समुदाय को एक बहुत बड़ी प्राकृतिक जंजीर से मुक्ति दी है। अगर पिल न होता, तो यौन क्रांति भी न होती। यौन क्रांति न होती, तो स्त्री स्वतंत्रता के आयाम भी बहुत सीमित रह जाते।
बेशक यह जादुई गोली उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितना पेनिसिलिन का आविष्कार, जिसने चिकित्सा के क्षेत्र में एक चमत्कार का काम किया। पिल का महत्व एसपिरिन या पैरासिटामोल जितना भी नहीं है। लेकिन ये दवाएं हैं। पिल कोई दवा नहीं है। वैसे गर्भनिरोधक गोली का आविष्कार भी स्त्रियों में बांझपन का इलाज खोजने की प्रक्रिया में हुआ था। आज भी पिल का प्रयोग कई स्त्री रोगों का इलाज करने के लिए होता है, लेकिन अधिकतर मामलों में यह गर्भनिरोधक की तरह ही प्रयुक्त होता है और गर्भाधान कोई बीमारी नहीं है। लेकिन अनिच्छित गर्भाधान एक बहुत बड़ी समस्या जरूर है, जिसके कुफल स्त्री को ही भुगतने पड़ते हैं। कहा जा सकता है कि उसके लिए तो यह बीमारियों की बीमारी है। पिल ने उन्हें सुरक्षित और स्वतंत्र जीवन जीने का अवसर प्रदान किया है। इस मायने में यह छोटी-सी गोली जितनी जादुई है, उतनी ही क्रांतिकारी भी।
गर्भाधान की जिम्मेदारी सौंप कर प्रकृति ने स्त्रियों के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है। पुरुष के हिस्से सिर्फ आनंद और स्त्री के हिस्से आनंद के साथ-साथ एक बड़ी और लंबी जिम्मेदारी। इसी आधार पर अनेक स्त्रीवादी विचारकों का मत है कि स्त्री का शरीर तंत्र ही उसका सबसे बड़ा शत्रु है। रेडिकल मार्क्सवादी विचारक शुलामिथ फायरस्टोन मानती थीं कि जब तक स्त्री को गर्भाशय से मुक्ति नहीं मिलती, तब तक उसकी वास्तविक मुक्ति संभव नहीं है। गर्भाशय स्त्रियों को कई तरीकों से बाधित और कंडीशन करता है। यह उसके व्यक्तित्व को ही बदल देता है।
अनिच्छित गर्भाधान से छुटकारा पाने का प्रयास शायद उतना ही पुराना है जितना मानव संस्कृति का इतिहास। गर्भाधान न हो और हो जाए तो उससे छुटकारा पाया जा सके, इसके लिए अनेक तरीके खोजे जाते रहे। उनमें से कोई भी तरीका संतोषजनक नहीं था। कुछ तरीके तो ऐसे थे जिनसे स्त्री की जान पर बन आती थी। उस बेचारी को इज्जत और परिवार के सुख-चैन के लिए इस कठोर अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ता था। दुर्भाग्यवश आज भी दुनिया के बहुत बड़े इलाके में यह अग्निपरीक्षा जारी है। इन इलाकों में हमारा अपना देश भी शामिल है। हर साल हजारों या क्या पता लाखों स्त्रियां अनचाहे गर्भ से मुक्ति पाने की प्रक्रिया में भयावह यंत्रणा सहती हैं और उनमें से अनेक तो जान से भी हाथ धो बैठती हैं। स्पष्ट है कि मानव स्वाधीनता के औजार अभी भी कुछ खास देशों और एक खास वर्ग तक सीमित हैं। पिल भी ऐसा ही एक औजार है।
कुछ लोगों का मानना है कि पिल (और कंडोम) ने यौन अराजकता को बढ़ावा दिया है। अगर पिल न होता, तो स्त्रियां और पुरुष मर्यादा में रहते। पिल के कारण गर्भ निरोध की युक्ति इतनी आसान और इतनी कम खर्चीली हो गई है कि किसी को भी लंबे समय के रिश्तों में दिलचस्पी नहीं रही। मनुष्य पशुओं की तरह आचरण करने लगे हैं। व्यभिचारी स्त्री-पुरुषों की बन आई है। उन्हें अपने कर्म के परिणाम की चिंता नहीं रही, क्योंकि पिल है न।
यह आलोचना पूरी तरह निस्सार नहीं है, लेकिन इतना खतरा तो किसी भी नए आविष्कार के साथ जुड़ा हुआ होता है। सवाल यह है कि जब तक पिल बाजार में नहीं आया था, क्या दुनिया में व्यभिचार नहीं था ? या, यौन उच्छृंखलता नहीं थी? अपनी विवाहिता को साल-दर-साल गर्भवती करते जाना पुरुष सत्ता की यौन उच्छृंखलता नहीं थी तो क्या था? पिल का सबसे अहम योगदान यह है कि यह स्त्री को अपने शरीर पर नियंत्रण प्रदान करता है और इस तरह उसे स्वाधीन बनाता है। लेकिन यह कहना गलत है कि सिर्फ पिल ने स्त्री को स्वतंत्रता दी। सच यह है कि स्वतंत्रता का वातावरण और पिल, दोनों लगभग साथ-साथ आए। इसे सामाजिक विकास और वैज्ञानिक विकास का युग्म कहा जा सकता है। दोनों का ही ज्ञान और चेतना के प्रसार से गहरा संबंध है। ज्ञान की पुरानी अवस्था में न तो पिल की खोज की जा सकती थी और न चेतना की पुरानी अवस्था में इसका प्रयोग उतना व्यापक हो सकता था जितना आज है।
सवाल यह भी है कि स्वतंत्रता का दुरुपयोग किसे कहेंगे? स्त्री के संदर्भ में क्या पुरुष अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग हजारों वर्षों से नहीं करता आया है? लेकिन पिल ने अगर इन पचास वर्षों में स्त्री को यह चुनने की आजादी दी है कि जब वह चाहे, तभी गर्भाधान हो और औरत इसका लाभ उठाती है, तो किस तर्क से इसे स्वतंत्रता का दुरुपयोग कहा जा सकता है? वस्तुत: जिस यौन अराजकता की बात की जाती है, वह पिल की नहीं, वर्तमान उपभोक्ता संस्कृति की देन है। हां, पिल ने जिस एक महत्वपूर्ण सत्य से हमारा साक्षात्कार कराया है, वह यह है कि यौन समागम कोई उतनी बड़ी घटना नहीं है जितना इसे बना दिया गया है। यह वैसा ही एक मानव व्यवहार है जैसा खाना, पीना या चलना-फिरना। पिल का शुक्रिया कि उसकी मदद से हम एक बहुत बड़े मिथक से मुक्त हो पाए हैं, जिसने मानव जीवन को नरक बना रखा था।
यह शिकायत जरूर वाजिब है कि सत्ता और अर्थव्यवस्था की संरचना ने पिल तक औरतों की पहुंच को सीमित कर रखा है। यह इस बात का प्रमाण है कि गुलामी की कौन-सी बेड़ियां अभी तक मानव समाज के विकास को निरुद्ध किए हुए हैं। दूसरी ओर, पिल ने केवल स्त्री को ही नहीं, उसके साथी पुरुष को भी मुक्त किया है, जो इस बात का एक और प्रमाण है कि स्त्री मुक्ति और पुरुष मुक्ति दोनों साथ-साथ चलते हैं।
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